ठाणे, 2 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभय ओका ने रविवार को कहा कि शहरी विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का निर्माण वास्तविक विकास नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब उन्हें नागरिकों को विश्वास में लिए बिना या वैधानिक नियोजन प्रक्रिया का पालन किए बिना पूरा किया जा रहा हो।
ठाणे में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि स्वीकृत विकास योजना (डीपी) के प्रावधानों से बाहर जाकर नगर निकायों की परियोजनाओं को लागू करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी शहर के विकास की असली कसौटी यह है कि क्या बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग लोग उसकी सड़कों पर सुरक्षित तरीके से चल सकते हैं।
‘‘ठाणे शहर के लिए जन-केंद्रित परिवहन’’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोदकर और शहरी योजनाकार सुलक्षणा महाजन सहित कई लोग मौजूद थे।
न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि महाराष्ट्र क्षेत्रीय एवं नगर नियोजन (एमआरटीपी) अधिनियम के तहत नगर निगमों को नियोजन प्राधिकरण का दर्जा प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार, 10 साल की अवधि के लिए तैयार की जाने वाली विकास योजनाओं को अंतिम मंजूरी से पहले जनता की आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित करने होते हैं। उन्होंने कहा कि बाद में किसी बदलाव के लिए भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और जनता से परामर्श आवश्यक है।
पूर्व न्यायाधीश ने दावा किया कि ठाणे में कई बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं वर्तमान में शहर की स्वीकृत विकास योजना में शामिल किए बिना ही लागू की जा रही हैं और एमआरटीपी अधिनियम के प्रावधानों को दरकिनार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा, ‘‘स्वीकृत विकास योजना का हिस्सा नहीं होने वाली परियोजनाओं को नागरिकों से परामर्श किए बिना लागू करना कानूनी रूप से गलत है। केवल पार्षदों, विधायकों या सांसदों के चुने जाने से शहर का पूरा अधिकार जनप्रतिनिधियों को नहीं मिल जाता। शहर हर निवासी का है।”
न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि सड़कें, फ्लाईओवर, राजमार्ग और मेट्रो नेटवर्क केवल बुनियादी ढांचे के साधन हैं, लेकिन ये अपने आप में विकास का पैमाना नहीं हो सकते।
उन्होंने कहा कि विकास का वास्तविक मापदंड यह है कि आम नागरिक सुरक्षित, सम्मानजनक और बेहतर जीवन जी पा रहे हैं या नहीं।
न्यायमूर्ति ओका ने कहा कि किसी भी शहर का पहला परीक्षण यह होता है कि क्या बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और दिव्यांग लोग सड़कों पर सुरक्षित और बिना किसी रुकावट के चल सकते हैं।
भाषा शफीक नरेश
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