यदि भाषा विरोध बीमारी है, तो अधिकतर राज्य इससे ग्रस्त हैं : राज ठाकरे ने भागवत पर साधा निशाना
यदि भाषा विरोध बीमारी है, तो अधिकतर राज्य इससे ग्रस्त हैं : राज ठाकरे ने भागवत पर साधा निशाना
(फाइल फोटो के साथ)
मुंबई, 10 फरवरी (भाषा) महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने सोमवार को कहा कि अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के विचार में अपनी भाषा के पक्ष में प्रदर्शन करना एक “बीमारी” है, तो देश के अधिकतर राज्य इससे ग्रस्त हैं।
ठाकरे ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में यह भी दावा किया कि सात और आठ फरवरी को आरएसएस के शताब्दी समारोह के अवसर पर यहां आयोजित भागवत के कार्यक्रम में शामिल हुए लोग उनके प्रति प्रेम के कारण नहीं, बल्कि नरेन्द्र मोदी सरकार के डर से आए थे।
हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इन टिप्पणियों को खारिज करते हुए कहा कि लोग आरएसएस के कार्यक्रमों में स्वेच्छा से और अनुशासन के साथ भाग लेते हैं।
मुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस ने ठाकरे द्वारा भागवत की आलोचना किये जाने को भाव नहीं देने की कोशिश करते हुए कहा कि जिन लोगों को कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया था, वे बुरा महसूस कर रहे थे।
सत्तारूढ़ महायुति की अगुवा भाजपा ने कहा कि मराठी गौरव का विषय है, लेकिन किसी भी भाषा को संघर्ष का नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बने रहना चाहिए।
ठाकरे ने कहा कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों में क्षेत्रीय भावना प्रबल है, पंजाब, पश्चिम बंगाल और गुजरात में भी ऐसी ही भावना देखने को मिलती है।
उन्होंने कहा कि जब देश के चार-पांच राज्यों से बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में जाते हैं और वहां अकड़ दिखाते हैं, स्थानीय संस्कृति को नकारते हैं, स्थानीय भाषा का अपमान करते हैं और अपना अलग वोट बैंक बनाते हैं, तो इससे वहां के लोगों में नाराजगी पैदा होती है और गुस्सा भड़क उठता है।
ठाकरे ने सवाल किया कि क्या भागवत इसे भी “बीमारी” कहेंगे।
पिछले सप्ताहांत मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से संवाद करते हुए भाषा विवाद पर कहा था कि इस “स्थानीय बीमारी” को फैलने नहीं देना चाहिए।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ठाकरे ने कहा, “अगर भागवत को लगता है कि भाषा और राज्य के प्रति मोह एक बीमारी है, तो देश के अधिकतर राज्य इससे ग्रस्त हैं।”
ठाकरे ने यह भी कहा कि जब उत्तर प्रदेश और बिहार से हजारों लोगों को गुजरात से निकाला गया था, तब भागवत ने वहां ऐसे “उपदेश” क्यों नहीं दिए।
उन्होंने पूछा कि कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब में ऐसे बयान क्यों नहीं दिए गए।
उन्होंने दावा किया, ‘‘भागवत इस तरह की टिप्पणी करने का साहस इसलिए दिखा सकते हैं, क्योंकि मराठी मानुष सहिष्णु हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा, सत्ता में बैठे लोगों में दम नहीं हैं।’’
पिछले महीने हुए नगर निगम चुनाव में एमएनएस और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने मराठी अस्मिता और ‘भूमिपुत्र’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ा था।
मनसे नेता ने कहा कि वह संघ के काम का सम्मान करते हैं, लेकिन उसे अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक रुख नहीं अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि और अगर वह (संघ) ऐसा करता है, तो उसे पहले उस सरकार को फटकार लगानी चाहिए, जो ‘पूरे देश में हिंदी थोप रही है (जो राष्ट्रीय भाषा भी नहीं है)’ और फिर आकर हमें सद्भाव के बारे में सिखाना चाहिए।
इन टिप्पणियों का जवाब देते हुए प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने ‘एक्स’ लिखा कि मनसे नेता को अपनी इस ‘गलत धारणा’ से बाहर निकलने की जरूरत है कि लोग डर के मारे आरएसएस के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।
उपाध्याय ने कहा, ‘‘आरएसएस ने सौ वर्षों के कार्यों में सामाजिक स्वीकृति हासिल की है, जबकि मनसे जैसी स्वार्थी राजनीतिक पार्टियां कुछ ही दशकों में लुप्त हो गईं। ठाकरे को इस पर विचार करना चाहिए।’’
भाषा राजकुमार दिलीप
दिलीप

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