मुंबई, 17 सितंबर (भाषा) मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे द्वारा अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त करने के फैसले के बाद, मुंबई उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि स्थानीय आजाद मैदान में उनके प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन की अनुमति न देने संबंधी अंतरिम याचिका पर कोई आदेश जारी करने की अब आवश्यकता नहीं है।
एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘एमी फाउंडेशन’ ने बुधवार को उच्च न्यायालय में एक अंतरिम याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि प्रदर्शनकारियों ने मुंबई की ओर मार्च करने के लिए लोगों को इकट्ठा कर लिया है, जबकि संबंधित अधिकारियों से किसी भी जुलूस या हड़ताल के आयोजन की कोई अनुमति नहीं ली गई है।
हालांकि, बृहस्पतिवार को अदालत को सूचित किया गया कि जरांगे मराठा आरक्षण के मुद्दे पर अपनी भूख हड़ताल जारी रखने के लिए मुंबई नहीं आ रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने कहा कि ताजा घटनाक्रम को देखते हुए याचिका पर कोई अंतरिम आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए 24 सितंबर की तारीख तय की।
जरांगे (44) ने सुबह में अपना 20 दिन पुराना अनशन समाप्त कर दिया है और महाराष्ट्र सरकार को मराठा आरक्षण की मांगों पर विचार करने के लिए तीन महीने का समय दिया है।
उन्होंने मध्य महाराष्ट्र के बीड जिले के पाटोदा में एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के बाद यह घोषणा की।
इस प्रतिनिधिमंडल में मराठा आरक्षण पर कैबिनेट उप-समिति के प्रमुख वरिष्ठ मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल, दादा भुसे, विधान परिषद सदस्य प्रसाद लाड, विधायक सुरेश धस और वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
जरांगे ने अगस्त के अंत में जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव में नये सिरे से अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी। वह इस विरोध प्रदर्शन को आगे बढ़ाने के लिए मुंबई जा रहे थे, तभी उन्होंने रास्ते में ही अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर दिया।
वह हैदराबाद गजट, सतारा गजट और औंध गजट जैसे ऐतिहासिक प्रशासनिक रिकॉर्ड को ‘‘आधिकारिक मान्यता’’ देने की मांग कर रहे हैं, ताकि मराठा अपनी कुनबी वंशावली साबित कर सकें और सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण के लाभ का दावा कर सकें।
भाषा
सुरेश माधव
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