भारतीय इतिहास की पढ़ाई को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त’’ करने की जरुरत : अमीश

भारतीय इतिहास की पढ़ाई को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त’’ करने की जरुरत : अमीश

भारतीय इतिहास की पढ़ाई को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त’’ करने की जरुरत : अमीश
Modified Date: August 2, 2026 / 11:16 am IST
Published Date: August 2, 2026 11:16 am IST

पुणे, दो अगस्त (भाषा) भारतीय इतिहास की पढ़ाई को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त’’ करने की जरुरत पर जोर देते हुये लेखक अमीश त्रिपाठी ने कहा कि कई स्कूलों की इतिहास की किताबों में अब भी औपनिवेशिक दौर के पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं।

त्रिपाठी ने इसके साथ ही कहा है कि हर पीढ़ी ने अपने समय में विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है और ‘जेन जेड’ भी इससे अलग नहीं है लेकिन असहमति का प्रदर्शन हमेशा संविधान की सीमाओं के भीतर होना चाहिए, जैसा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने परिकल्पित किया था।

अमीश अपनी नयी पुस्तक ‘ध्रुव-तारा: द ग्रेट इंडियन हिस्ट्री क्विज’ के बारे में शनिवार को ‘पीटीआई-भाषा’ से पुणे में बातचीत कर रहे थे ।

त्रिपाठी ने भारतीय इतिहास की पढ़ाई को ‘‘उपनिवेशवादी सोच से मुक्त’’ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि कई स्कूलों की इतिहास की किताबों में अब भी औपनिवेशिक दौर के पूर्वाग्रह दिखाई देते हैं।

भारतीय इतिहास की शिक्षा पर त्रिपाठी ने कहा कि कई पाठ्यपुस्तकों में अब भी उपनिवेशवादी दृष्टिकोण मौजूद है।

उन्होंने कहा, ‘‘आज भी कई चीजें इतिहास के उपनिवेशवादी संस्करण को आगे बढ़ा रही हैं।’’

उन्होंने बताया कि उनकी नई पुस्तक का उद्देश्य रोचक कहानी के माध्यम से बच्चों को ‘‘उपनिवेशवादी दृष्टिकोण से मुक्त’’ इतिहास से जुड़े तथ्य प्रस्तुत करना है।

उन्होंने कहा, ‘‘इस पुस्तक का उद्देश्य मनोरंजक कहानी के जरिए बच्चों को उपनिवेशवादी सोच से मुक्त दृष्टिकोण के साथ इतिहास के तथ्य सिखाना है, ताकि वे कहानी का आनंद भी लें और साथ ही बहुत कुछ सीखें भी।’’

लेखक ने कहा कि युवाओं को विरोध-प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है, बशर्ते वे बदलाव की मांग संवैधानिक तरीकों से करें।

डॉ. आंबेडकर के ‘ग्रामर ऑफ एनार्की’ संबंधी भाषण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा , ‘‘मेरा सिर्फ इतना कहना है कि यह विरोध असंवैधानिक दायरे में नहीं जाना चाहिए। भारत में अब एक संवैधानिक व्यवस्था है। हमें उसी व्यवस्था का पालन करना चाहिए और जिन सुधारों की जरूरत है, उन्हें संवैधानिक माध्यमों से आगे बढ़ाना चाहिए। यदि वे प्रदर्शन कर रहे हैं तो उन्हें पूरा अधिकार है। हर पीढ़ी ने पहले भी ऐसा किया है।’’

त्रिपाठी ने कहा, ‘‘हर पीढ़ी ने कॉलेज के दिनों में किसी न किसी आंदोलन में हिस्सा लिया है। ‘बूमर’ पीढ़ी, जो आज की पीढ़ी के दादा-दादी है, उनके समय में नक्सल आंदोलन अपने चरम पर था, जिसमें सशस्त्र विद्रोह भी शामिल था।’’

उन्होंने कहा कि इसके बाद की पीढ़ी ‘जेन एक्स’ ने भी मंडल आंदोलन जैसे कई विरोध-प्रदर्शनों में भाग लिया।

उन्होंने कहा, ‘‘मिलेनियल पीढ़ी के भी अपने आंदोलन थे, जिनमें 2011-12 का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शामिल है।’’

त्रिपाठी ने कहा कि केवल ‘जेन जेड’ को विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए निशाना बनाना उचित नहीं है, क्योंकि पहले की पीढ़ियों ने भी बड़े-बड़े आंदोलन देखे हैं।

हाल ही में हजारों छात्रों ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में नीट प्रश्नपत्र लीक और अन्य परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन किया था। उनकी प्रमुख मांगों में से एक 25 जुलाई को पूरी हुई, जब धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दिया।

इससे पहले त्रिपाठी ने कहा कि पुस्तक प्रचार यात्रा के दौरान छात्रों से बातचीत में उन्हें महसूस हुआ कि इतिहास आज भी बच्चों के लिए सबसे कम रोचक विषयों में से एक है।

उन्होंने दावा किया, ‘‘जब मैं पूछता हूं कि क्या इतिहास उन्हें उबाऊ लगता है, तो 70 से 80 प्रतिशत छात्र हाथ उठाते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इतना महत्वपूर्ण विषय हमने पढ़ाने के तरीके और पाठ्यपुस्तकों के कारण बेहद उबाऊ बना दिया है।’’ उनका मानना है कि इतिहास को रटने के बजाय कहानियों के माध्यम से पढ़ाया जाना चाहिए।

पुणे कैंट क्षेत्र स्थित कई दशक पुराने सड़क किनारे स्थित बुक स्टॉल ‘सोलंकी बुकसेलर्स’ में अपनी पुस्तक का प्रचार करते हुए त्रिपाठी ने उम्मीद जताई कि यह पुस्तक बच्चों में भारतीय इतिहास के प्रति रुचि बढ़ाएगी और उन्हें इतिहास के कम चर्चित तथ्यों से मनोरंजक ढंग से परिचित कराएगी।

भाषा शोभना रंजन

रंजन


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