सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को दी थीं 10 दया याचिकाएं, लेकिन निष्ठा नहीं जताई : वंशज

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को दी थीं 10 दया याचिकाएं, लेकिन निष्ठा नहीं जताई : वंशज

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को दी थीं 10 दया याचिकाएं, लेकिन निष्ठा नहीं जताई : वंशज
Modified Date: June 16, 2026 / 08:46 pm IST
Published Date: June 16, 2026 8:46 pm IST

पुणे, 16 जून (भाषा) पुणे की एक अदालत में विनायक दामोदर सावरकर के एक पोते ने स्वीकार किया कि हिंदुत्व विचारक ने ब्रिटिश सरकार को 10 दया याचिकाएं दी थीं, जिनमें उन्होंने अपनी सजा में कटौती करने का अनुरोध किया था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन याचिकाओं का लहजा विनम्रतापूर्ण नहीं था और उनमें अंग्रेजों के प्रति निष्ठा जताने वाले शब्द नहीं थे।

वी. डी. सावरकर के पोते सात्यकी सावरकर ने यह भी कहा कि कैदियों की ओर से ऐसी याचिकाएं देने की कोई बाध्यता नहीं थी।

उन्होंने यह बात सोमवार को वकील मिलिंद पवार द्वारा जिरह किये जाने के दौरान कही। मिलिंद पवार एमपी/एमएलए (सांसद/विधायक) अदालत के विशेष न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष जारी आपराधिक मानहानि के मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से पेश हुए थे।

यह मामला मार्च 2023 में लंदन में एक भाषण के दौरान की गई राहुल गांधी की कथित टिप्पणियों से संबंधित है।

सात्यकी सावरकर ने शिकायत दायर की थी कि राहुल गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर को बदनाम किया है। कांग्रेस नेता ने अपने भाषण में दावा किया था कि हिंदुत्व विचारक ने एक पुस्तक में लिखा कि उन्होंने और उनके पांच-छह दोस्तों ने एक मुस्लिम युवक पर हमला किया था और ऐसा करने में उन्हें आनंद आया था। शिकायतकर्ता का कहना है कि सावरकर की किसी भी लेखनी में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है।

जिरह के दौरान, सात्यकी ने स्वीकार किया कि ‘‘सावरकर ने 10 बार दया याचिका दी थी’’ और इन याचिकाओं का रिकॉर्ड सरकार के पास मौजूद है।

उन्होंने यह भी माना कि ‘‘दया याचिका देना सजा कम कराने के लिए एक आधिकारिक प्रक्रिया है, और सावरकर ने इसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया था।’’

शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि किसी भी कैदी पर दया याचिका देने की कोई बाध्यता नहीं थी और ऐसा करना कैदी की इच्छा पर निर्भर था।

अपने बयान में सात्यकी सावरकर ने स्वीकार किया कि सरकार के पास 10 दया याचिकाओं का रिकॉर्ड मौजूद है और ब्रिटिश प्रशासन के पास ऐसी याचिकाओं पर सजा में कटौती करने या उसे बदलने का अधिकार था।

सात्यकी सावरकर ने यह भी कहा कि उनके पास ऐसा कोई तुलनात्मक अध्ययन या रिपोर्ट नहीं है जिसमें सावरकर की दया याचिकाओं की तुलना अन्य कैदियों की याचिकाओं से की गई हो, या जिससे यह साबित होता हो कि याचिकाओं में इस्तेमाल की गई भाषा महज औपचारिक या रणनीतिक थी।

सात्यकी ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि क्या सावरकर हर याचिका पर ‘‘मैं आपका सबसे आज्ञाकारी सेवक, वी डी सावरकर’’ जैसे शब्दों के साथ हस्ताक्षर करते थे।

सात्यकी ने अदालत को बताया कि हालांकि, वी डी सावरकर ने दया याचिकाएं दी थीं, लेकिन इनमें उनका लहजा विनम्रतापूर्ण नहीं था और उनमें ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा जताने वाले शब्द भी नहीं थे।

उन्होंने कहा कि उन याचिकाओं में वी. डी. सावरकर ने सजा में कटौती करने का अनुरोध किया था।

उस दौर के क्रांतिकारियों का जिक्र करते हुए सात्यकी ने इस बात से सहमति जताई कि राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफ़ाकुल्ला खान जैसे क्रांतिकारियों ने दया याचिकाएं नहीं दी थीं, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उन सभी कैदियों के नाम नहीं पता हैं जिन्होंने शायद ऐसी याचिकाएं दी हों।

जिरह के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि गवाह ने भारत सरकार के तत्कालीन गृह सदस्य रेजिनाल्ड क्रैडॉक की राय का जिक्र किया, जिन्होंने सावरकर की दया याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा को ‘‘भ्रामक’’ बताया था।

राहुल गांधी ने अपने बचाव में ऐतिहासिक दस्तावेजों का सहारा लेने की कोशिश की है।

इस मामले की सुनवाई पुणे की विशेष एमपी/एमएलए अदालत में हो रही है।

भाषा सुभाष शफीक

शफीक


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