मुंबई, 12 जून (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने घरेलू सहायिका के साथ छेड़छाड़ के आरोपी एक व्यक्ति को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि भारत जैसे पारंपरिक समाज में परिवार यौन उत्पीड़न तथा छेड़छाड़ के मामलों की शिकायत करने में हिचकिचाते हैं और सिर्फ प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी के आधार पर ऐसे मामलों को खारिज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति रंजीत सिंह भोंसले की एकल पीठ ने बुधवार को एक आदेश में केरल निवासी 58 वर्षीय व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी। इस व्यक्ति ने अपनी घरेलू सहायिका से छेड़छाड़ के आरोप में 2019 में दर्ज की गई प्राथमिकी को निरस्त किए जाने का आग्रह किया था।
शिकायत के अनुसार, जब पीड़िता 10 मार्च, 2019 को आरोपी के घर काम के सिलसिले में गई, तो उसने कथित तौर पर उसके साथ छेड़छाड़ की। महिला वहां से भागने में सफल रही और बाद में उसने अपने पति को इस कथित घटना के बारे में बताया।
इसके बाद उनके पति ने सोसाइटी के सदस्यों को घटना के बारे में बताया। महिला ने दो अप्रैल को आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर प्राथमिकी लिखी गई।
आरोपी ने उच्च न्यायालय में अपनी याचिका में इस देरी पर सवाल उठाया और कहा कि महिला तथा उसके पति ने उसे झूठे मामले में फंसाया है, क्योंकि उसने उससे पैसे की मांग की थी।
उसने यह दावा भी किया कि कथित घटना वाले दिन की सीसीटीवी फुटेज में महिला को शांत और संयत ढंग से इमारत से बाहर निकलते हुए देखा जा सकता है।
हालांकि, अदालत ने दोनों दलीलों को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मामला बनता है।
अदालत ने कहा, ‘‘हमारे जैसे पारंपरिक समाज में, दुर्भाग्य से, कई परिवारों के लिए इस तरह के अपराधों के मामले में कोई वास्तविक आपराधिक मुकदमा शुरू करना भी बेहद मुश्किल होता है।’’
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मेरी राय में, महिलाओं के खिलाफ अपराधों और इसी तरह के मामलों में, सिर्फ़ बिना वजह हुई देरी के आधार पर आपराधिक मुकदमे को खारिज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि यह देरी किसी बुरी नीयत, निजी बदले की भावना या प्रतिशोध के कारण न हो, जो पहली नजर में साबित हो रहा हो।’’
भाषा
नेत्रपाल माधव
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