महाराष्ट्र में वृक्षों का आवरण बढ़ा, वन क्षेत्र घटा और नदियों में प्रदूषण बढ़ा: आर्थिक सर्वेक्षण

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महाराष्ट्र में वृक्षों का आवरण बढ़ा, वन क्षेत्र घटा और नदियों में प्रदूषण बढ़ा: आर्थिक सर्वेक्षण

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  • Publish Date - March 6, 2026 / 03:31 PM IST,
    Updated On - March 6, 2026 / 03:31 PM IST

मुंबई, छह मार्च (भाषा) महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य का पारिस्थितिक परिदृश्य मिश्रित तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसमें वृक्षों के आवरण और वन्यजीव संरक्षण में वृद्धि देखी गई है जबकि प्रमुख वन पारिस्थितिक तंत्रों में कमी तथा प्रमुख नदियों में प्रदूषण में वृद्धि के संकेत मिलते हैं।

यह सर्वेक्षण बृहस्पतिवार को राज्य विधानमंडल में पेश किया गया।

सर्वेक्षण से यह संकेत मिलता है कि लक्षित संरक्षण कार्यक्रमों और सामाजिक वानिकी पहलों से कुछ पर्यावरणीय संकेतकों में सुधार हुआ है, लेकिन वन क्षरण, तीव्र शहरीकरण और अपर्याप्त सीवेज उपचार अब भी राज्य के पारिस्थितिक तंत्र पर दबाव बनाए हुए हैं।

सर्वेक्षण के अनुसार, महाराष्ट्र का कुल वन क्षेत्र 50,859 वर्ग किलोमीटर है जो इसके 3,07,713 वर्ग किलोमीटर के भौगोलिक क्षेत्र का 16.5 प्रतिशत है। यह राष्ट्रीय वन नीति के तहत निर्धारित 33 प्रतिशत के मानक से काफी कम है।

सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 के आकलन की तुलना में राज्य में वन क्षेत्र में 54.47 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘‘वन क्षेत्र’’ और ‘‘वृक्ष आवरण’’ अलग-अलग श्रेणियां हैं और पर्यावरणीय स्वास्थ्य का आकलन करते समय इनका परस्पर उपयोग नहीं किया जा सकता है।

वन क्षेत्र से तात्पर्य उस भूमि से है जिसे सरकार द्वारा कानूनी रूप से वन घोषित किया गया है जिसमें आरक्षित या संरक्षित वन भी शामिल हैं। ऐसे क्षेत्रों में घनी वनस्पति होना आवश्यक नहीं है और इनमें ऐसे भू-भाग भी शामिल हो सकते हैं जहां वृक्षों की वृद्धि कम या न के बराबर हो जैसे कि अल्पाइन चारागाह, आर्द्रभूमि या उपेक्षित भूभाग।

दूसरी ओर वृक्ष आवरण से तात्पर्य एक हेक्टेयर से कम आकार के भूभाग में वृक्षों के छोटे-छोटे समूहों या दर्ज वनों के बाहर वृक्षों के आवरण है। इनमें वृक्षारोपण, सड़क किनारे के वृक्ष और नहरों या खेतों के किनारे पगडंडियों पर लगाए गए वृक्षों के वे समूह भी शामिल हैं जो प्राकृतिक वन पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं।

सर्वेक्षण में बताया गया है कि वनों के बाहर वृक्ष आवरण के मामले में महाराष्ट्र देश में पहले स्थान पर है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, राज्य में 14,525 वर्ग किलोमीटर वृक्ष आवरण है जो इसके भौगोलिक क्षेत्र का 4.7 प्रतिशत है।

हालांकि, सर्वेक्षण में उद्धृत पर्यावरण विशेषज्ञों ने सावधान करते हुए कहा है कि वृक्ष आवरण में वृद्धि से प्राकृतिक वनों के क्षरण से होने वाली पारिस्थितिक क्षति की भरपाई आवश्यक रूप से नहीं हो जाती। प्राकृतिक वन अधिक जटिल जैव विविधता का समर्थन करते हैं और कार्बन भंडारण तथा पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इन उपलब्धियों के बावजूद, सर्वेक्षण जल प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर गंभीर चिंताओं को रेखांकित करता है।

राज्य की प्रमुख नदियां अब भी भारी पारिस्थितिक दबाव का सामना कर रही हैं। सर्वेक्षण में उद्धृत महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, मुंबई की मीठी नदी में प्रदूषण का स्तर अत्यधिक पाया गया है, जहां जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) 101.8 मिलीग्राम प्रति लीटर और मल जनित कोलीफॉर्म जीवाणु का स्तर 1,882.2 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया है।

इसी तरह, पुणे की मुला-मुठा नदी में भी जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) और मल जनित कोलीफॉर्म जीवाणु का स्तर ऊंचा बना हुआ है, जो अनुपचारित सीवेज और शहरी अपशिष्ट जल के निरंतर प्रवाह से होने वाले प्रदूषण की ओर संकेत करता है।

नदी प्रदूषण के पीछे एक प्रमुख कारण सीवेज उपचार क्षमता में कमी है। सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2025–26 में दिसंबर तक राज्य में उत्पन्न कुल सीवेज का केवल 51.4 प्रतिशत ही उपचारित किया जा सका। इसका अर्थ है कि लगभग आधा अपशिष्ट जल अब भी बिना उपचार के नदियों और अन्य जल स्रोतों में छोड़ा जा रहा है।

भाषा सुरभि पवनेश

पवनेश