Patal Bhuvaneshwar Gufa/Image Credit: ScreenGrab / AI Generated / @Grok
Patal Bhuvaneshwar Cave: आपने कलयुग के बारे में कई बातें सुनी होंगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड के कमाऊ क्षेत्र में, गंगोलीहाट कसबे से लगभग 14 किलोमीटर दूर एक छोटी सी पहाड़ी पर “पाताल भुवनेश्वर गुफा“ है? माना जाता है कि यहाँ कलियुग का अंत तथा महाप्रलय का राज छिपा है। स्कंदपुराण के मानस खंड में इस गुफा का विस्तार से वर्णन मिलता है। आइये, पाताल भुवनेश्वर गुफा का रहस्य एवं पौराणिक मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं..
“पाताल भुवनेश्वर गुफा“ एक ऐसा रहस्यमयी स्थान है, जहाँ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव स्वयं निवास करते हैं। यहाँ भोलेनाथ के साथ सभी तैंतीस कोटि यानी (33 प्रकार के) देवी-देवता भी विराजमान है। इसे “पाताल लोक का द्वार” या “देवताओं का भूमिगत नगर” भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने मात्र से काशी, केदारनाथ और बैद्यनाथ की तपस्या से हज़ार गुना अधिक पुण्य मिलता है। चूना पत्थर से बनी यह प्राकृतिक गुफा लगभग 160 मीटर लम्बी और 90 फीट गहरी है।
गुफा के अंदर जाने के लिए लगभग 80 से 100 सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। रास्ता संकरा और फिसलन भरा है। लोहे की जंजीर पकड़कर धीरे-धीरे नीचे उतरना पड़ता है। यह यात्रा करना ऐसा प्रतीत होता है मानों जैसे मनुष्य अपने अंदर के अन्धकार से गुज़रकर प्रकाश की ओर बढ़ रहा हो..
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में अयोध्या के शासक सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने सबसे पहले इस गुफा की खोज की थी। एक बार वे जंगल में एक हिरन का पीछा करते हुए रास्ता भटक गए और थककर एक पेड़ के नीचे सो गए। सपने में उसी हिरन ने उन्हें इस गुफा का रास्ता दिखाया। जब राजा की आँख खुली, तो वे गुफा के पास पहुंचें। द्वारपाल की अनुमति लेकर वे जैसे ही अंदर गए, उन्हें साक्षात शेषनाग मिले।
शेषनाग ने राजा को अपने फन पर बिठाकर पूरी गुफा की सैर कराई, जहां राजा ऋतुपर्ण ने भगवान शिव सहित तैंतीस कोटि देवी-देवताओं के साक्षात दर्शन किए। इसके बाद यह गुफा बंद हो गई। स्कंदपुराण के अनुसार, यह गुफा कलियुग में दोबारा खुलनी थी।
पाताल भुवनेश्वर गुफा के अंदर कई हैरान कर देने वाली आकृतियाँ बनी हैं। इसका प्रवेश द्वार बिलकुल शेषनाग के मुख जैसा दिखता है। अंदर जाने पर शेषनाग की पसलियां और फन साफ नज़र आते हैं। थोड़ा और आगे बढ़ने पर आदि गणेश की अद्भुत आकृति दिखाई देती है। मान्यता है कि जब भगवान शिव ने गणेश का सिर काटा था, तब उनका मूल (असली) सिर इसी स्थान पर गिरा था। बाद में हाथी का सिर लगाया गया, लेकिन उनका मूल सिर आज भी यहां सुरक्षित है।
इस सिर के ठीक ऊपर आठ पंखुड़ियों वाला एक “ब्रह्मकमल” बना है, जिससे रहस्मयी तरीके से लगातार अमृत की बुँदे टपकती रहती है। ये बुँदे सीधे गणेश जी के सिर पर गिरती है।
द्वापर युग में, महाभारत के युद्ध के बाद पांडव जब स्वर्गारोहण की अंतिम यात्रा पर निकले तो उन्होंने इस गुफा में शिव की आराधना की। उसके बाद कलियुग में आदि शंकराचार्य ने लगभग 1191 ईस्वी में इस गुफा की पुनर्खोज की और यहां तांबे का शिवलिंग स्थापित कर नियमित पूजा की शुरुआत की। तब से भंडारी परिवार के पुजारी बीस से अधिक पीढ़ियों से यहां सेवा कर रहे हैं।
इस गुफा के अंदर चार रहस्यमयी द्वार मौजूद हैं। पाप द्वार, रण द्वार, धर्म द्वार और मोक्ष द्वार। मान्यताओं के अनुसार, रावण की मृत्यु के बाद ‘पाप द्वार’ और महाभारत युद्ध के समाप्त होने पर ‘रण द्वार’ हमेशा के लिए बंद हो गया। वर्तमान में केवल ‘धर्म द्वार’ और ‘मोक्ष द्वार’ ही खुले हुए हैं। कहा जाता है कि कलयुग के अंत में “धर्म द्वार” भी पूरी तरह खुलेगा और एक नए युग की शुरुआत होगी, जिसके बाद आने वाले ‘सतयुग’ में केवल ‘मोक्ष द्वार’ ही मुख्य रहेगा।
द्वारों के अलावा, यहाँ सबसे अनोखे ‘युगों के स्तंभ’ बने हैं। गुफा में चट्टानों के चार प्राकृतिक उभार हैं, जो चारों युगों के प्रतीक हैं। इनमें सतयुग का स्तंभ सबसे छोटा है, जबकि त्रेता और द्वापर के स्तंभ उससे बड़े हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ‘कलयुग’ का स्तंभ’ सबसे लंबा है और यह धीरे-धीरे लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है।
इस गुफा की सबसे रहस्यमयी और बड़ी बात तो यहां के शिवलिंग से जुडी है। गुफा के अंदर मौजूद यह शिवलिंग लगातार बड़ा हो रहा है। स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं के अनुसार, जिस दिन यह शिवलिंग बढ़ते-बढ़ते गुफा की छत से टकरा जाएगा, उसी दिन महाप्रलय आएगा और दुनिया का अंत होगा। इसके बाद नया सृष्टि का एक नया चक्र शुरू होगा। यह रहस्य कोई निश्चित तारीख नहीं बताता, बल्कि युग परिवर्तन का एक प्रतीक है। माना जाता है कि जब दुनिया में अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुंचेगा और यह प्राकृतिक संकेत पूरा होगा, तभी प्रलय आएगा।
सच कहें तो पाताल भुवनेश्वर सिर्फ घूमने की कोई जगह नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। यह वो जगह है जहाँ कदम रखते ही वक्त ठहर जाता है और गुफा के पत्थर खुद युगों की गाथा गाते हैं। यहाँ आकर हर व्यक्ति को यह अहसास हो जाता है कि इंसानी जीवन कितना छोटा है और सृष्टि का यह पूरा चक्र कितना असीमित है।
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