विश्व कप : डच किला फतेह, जर्मनी का दबदबा कायम और भारत ने फिर गंवाया मौका

विश्व कप : डच किला फतेह, जर्मनी का दबदबा कायम और भारत ने फिर गंवाया मौका

विश्व कप :  डच किला फतेह, जर्मनी का दबदबा कायम और भारत ने फिर गंवाया मौका
Modified Date: August 31, 2026 / 10:02 am IST
Published Date: August 31, 2026 10:02 am IST

(मोना पार्थसारथी)

वॉवरे / एम्सटेलवीन , 31 अगस्त (भाषा ) पिछले सोलह दिन से चल रहे विश्व हॉकी के महासमर में एक ओर महिला वर्ग में डच दबदबा टूटा तो पुरूष हॉकी में जर्मनी ने एक बार फिर अपना लोहा मनवाया जबकि भारतीय टीमें पांच दशक बाद पदक के करीब पहुंचकर एक बार फिर चूक गई ।

यूट्रेक्ट में 1998 में हुए विश्व कप के बाद पहली बार महिला और पुरूष टूर्नामेंट एक साथ खेले गए लेकिन दो देशों में और दो शहरों में । नीदरलैंड ने पहली बार एम्सटेलवीन में हॉकी के लिये खास तौर पर बनाये गए वेगनेर स्टेडियम में विश्व कप की मेजबानी की तो बेल्जियम के वॉवर में बेलफियस हॉकी एरेना के रूप में खेल को नया ठिकाना मिला ।

एम्सटेलवीन में खचाखच भरे स्टेडियम में संगीत के साथ हॉकी जलसे की तरह लगी तो ब्रसेल्स शहर से दूर वॉवरे में बीयर और वॉफेल्स के साथ हॉकी सुकून की तरह नजर आई । लेकिन दोनों ही मेजबान दिग्गज खिताब से वंचित रह गए । क्वार्टर फाइनल की बजाय पहले दौर के बाद क्रॉसओवर मुकाबलों वाले प्रारूप पर भी सवाल उठे ।

महिला वर्ग में टूटा डच दबदबा :

महिला हॉकी में नौ बार की चैम्पियन और पेरिस ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीदरलैंड को अर्जेंटीना की साहसी टीम ने नारंगी रंग से सराबोर खचाखच भरे स्टेडियम में घरेलू दर्शकों के सामने पेनल्टी शूटआउट में पटखनी दी । रोसारियो में 2010 में अर्जेंटीना जीती थी लेकिन उसके बाद से लगातार नीदरलैंड ने ही तीन विश्व कप जीते ।

बेल्जियम ने आस्ट्रेलिया को हराकर कांस्य पदक अपने नाम किया ।

एशियाई दिग्गज और पेरिस ओलंपिक रजत पदक विजेता चीन की टीम आठवें स्थान पर रही । नीदरलैंड की ड्रैग फ्लिकर यिब्बी यानसेन ने सर्वाधिक आठ गोल दागे और अंतरराष्ट्रीय गोल का शतक भी पूरा किया ।

महिला हॉकी में शीर्ष टीमों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा का आकलन इसी से किया जा सकता है कि दोनों सेमीफाइनल और कांस्य पदक के मुकाबले का फैसला एक गोल के अंतर से हुआ । फाइनल भी साठ मिनट के बाद 1 -1 से बराबरी पर था लेकिन पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना ने 3 -1 से बाजी मारी ।

पुरूष हॉकी में जर्मनी का दबदबा बरकरार :

बेहतरीन रक्षात्मक ढांचे के साथ खेलने वाली जर्मन टीम ने 2023 में भुवनेश्वर में जीते गए खिताब को बेल्जियम के वॉवर में भी बरकरार रखा । फीफा विश्व कप जीतने वाले स्पेन का हॉकी में खिताब जीतने का सपना एक बार फिर अधूरा रहा लेकिन 1998 के बाद पहली बार फाइनल में पहुंचना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं था ।

मेजबान नीदरलैंड को उसकी धरती पर हराकर खिताबी मुकाबले में पहुंची स्पेन ने जर्मनी को कड़ी चुनौती दी लेकिन जीत और हार के बीच 44वें मिनट में किया गया एक गोल भारी पड़ गया । इसके साथ ही जर्मनी ने चार खिताब जीतकर पाकिस्तान के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली ।

खिताब की प्रबल दावेदार मानी जा रही 2018 की चैम्पियन और सह मेजबान बेल्जियम सातवें स्थान पर खिसक गई जबकि महिला और पुरूष दोनों वर्गों में आस्ट्रेलिया को बैरंग लौटना पड़ा ।

भारतीय पुरूष टीम फिर चूकी , महिलाओं का ऐतिहासिक प्रदर्शन :

तोक्यो ओलंपिक 2021 में भारतीय महिला हॉकी टीम को चौथे स्थान तक ले जाने वाले कोच शोर्ड मारिन को विश्व कप में पदक के बिल्कुल करीब पहुंचकर चूकने का मलाल जरूर रहेगा । पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ एक मैच नीदरलैंड से हारने वाली भारतीय टीम ने पहले ही मैच में चीन को ड्रॉ पर रोककर अपने इरादे जाहिर कर दिये थे ।

दक्षिण अफ्रीका को 6 -1 से हराने और इंग्लैंड से ड्रॉ खेलने के बाद ग्रुप में दूसरे स्थान पर रहकर टीम दूसरे दौर में पहुंची । दूसरे दौर में डच टीम से मिली हार के बाद आस्ट्रेलिया को हराना जरूरी था लेकिन गोलरहित ड्रॉ के बाद सेमीफाइनल के दरवाजे बंद हो गए । पांचवें स्थान के मुकाबले में अपने से ऊंची रैंकिंग वाली जर्मनी को हराकर भारत ने 1974 के बाद विश्व कप में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया ।

भारत की इस टीम में 11 खिलाड़ियों का पहला विश्व कप था जिन्होंने विरोधी टीम के कद से डरे बिना साहसिक प्रदर्शन किया । खासकर युवा गोलकीपर बिछू देवी ने इंग्लैंड के खिलाफ ड्रॉ रहे मैच के आखिरी तीस सेकंड में जो गोल बचाया, उसे लंबे समय तक याद रखा जायेगा ।

वहीं 51 साल बाद विश्व कप में पदक जीतने का सपना लेकर गई पुरूष टीम के हाथ सिर्फ इंतजार ही आया । पूरे साठ मिनट तक एक लय से नहीं खेल पाने, बढत बनाने के बाद गोल गंवाने, डिफेंस के चरमराने और कप्तान हरमनप्रीत सिंह पर अत्यधिक निर्भरता का खामियाजा भारतीय टीम ने भुगता । ओलंपिक के इतिहास की सबसे सफल टीम विश्व कप में कभी उस प्रदर्शन को दोहरा क्यों नहीं सकी , यह यक्षप्रश्न बना हुआ है ।

भारतीय पुरूष हॉकी टीम में ओलंपिक से पहले बदलाव की गुंजाइश साफ नजर आ रही है । कई सीनियर खिलाड़ी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके तो टीम चयन को लेकर भी कई फैसलों पर सवाल उठे । जापान में अगले महीने होने वाले एशियाई खेलों के बाद भारतीय हॉकी के बदलाव के दौर की शुरूआत हो सकती है ।

विश्व कप में हुए मैचों का कुल लब्बोलुआब यही रहा कि तमाम तकनीक और अत्याधुनिक सुविधाओं के बावजूद सफलता का मूलमंत्र बरसों से वही है … पूरे 60 मिनट अच्छी और अनुशासित हॉकी ।

भाषा मोना पंत

पंत


लेखक के बारे में