जनता मांगे हिसाब: पांढुर्ना और रतलाम की जनता ने मांगा हिसाब

जनता मांगे हिसाब: पांढुर्ना और रतलाम की जनता ने मांगा हिसाब

जनता मांगे हिसाब: पांढुर्ना और रतलाम की जनता ने मांगा हिसाब
Modified Date: November 29, 2022 / 07:53 pm IST
Published Date: April 23, 2018 11:21 am IST

पांढुर्ना विधानसभा की भौगोलिक स्थित

अब बात करते हैं मध्यप्रदेश की पांढुर्ना विधानसभा सीट की 

छिंदवाड़ा जिले में आती है पांढुर्ना विधानसभा 

महाराष्ट्र के नागपुर और अमरावती जिले की सीमा से सटा है क्षेत्र

ST वर्ग के लिए आरक्षित है  सीट

कुल मतदाता- 1 लाख 93 हजार 818

पुरुष मतदाता- 1 लाख 657

महिला मतदाता-  93 हजार 156

इलाके में कपास और अरहर की बंपर पैदावार

फिलहाल सीट पर कांग्रेस का कब्जा

कांग्रेस के जतन ऊईके हैं वर्तमान विधायक  

पांढुर्ना विधानसभा क्षेत्र की सियासत

जैसे जैसे चुनाव का वक्त नजदीक आ रहा है…पांढुर्ना में सियासी पारा चढ़ने लगा है.. वर्तमान में यहां से कांग्रेस के जतन उईके विधायक हैं..लेकिन आगामी चुनाव में कांग्रेस के लिए यहां चुनौती आसान नहीं रहने वाली..क्योंकि बीजेपी अपनी इस परंपरागत सीट को दोबारा पाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगी। 

महाराष्ट्र के नागपुर और अमरावती जिले की सीमा से सटे पांढुर्ना विधानसभा की सियासत हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रही है.. एसटी वर्ग के लिए आरक्षित पांढुर्ना सीट 2003 तक सामान्य सीट हुआ करती थी..तब यहां से भाजपा के मारोतराव चुनाव जीते थे..इसके बाद 2008 में परिसीमन के बाद ये सीट आदिवासी कोटे में शामिल हो गई..और भाजपा के रामाराव कवरेती चुनाव जीते। लेकिन 2013 में कांग्रेंस ने 

पांढुर्ना सीट बीजेपी से छिन लिया..कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले जतन उईके ने भाजपा प्रत्याशी टीकाराम कोराची को 1478 वोटों से शिकस्त दी…अब जब चुनावी साल है..और जैसे-जैसे चुनाव का वक्त नजदीक आ रहा है पांढुर्ना में सियासी हलचल तेज हो गई है..पार्टी से टिकट पाने की चाहत में नेता फिर जनता के बीच पहुंचकर दरबार लगाने लगे हैं ..हालांकि आरक्षित सीट होने और स्थानीय आदिवासियों के राजनीति में ज्यादा सक्रिय नहीं होने से पांढुर्ना सीट पर  कांग्रेस और भाजपा में उम्मीदवारों का टोटा ही रहा है…भाजपा के संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो पिछला चुनाव हारने वाले टीकाराम कोराची का दावा सबसे मजबूत नजर आता है…इनके अलावा युवा चेहरा कमलेश उईके भी टिकट के प्रबल दावेदार हैं.. कांग्रेस की बात करें तो वर्तमान विधायक  जतन ऊईके टिकट की रेस में सबसे आगे है..हालांकि क्षेत्र में उनकी छवि निष्क्रिय विधायक की बन चुनी है जो उनके खिलाफ जा सकती है…कांग्रेस में इनके अलावा नीलेश उईके भी विकल्प हो सकते हैं..जो क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। 

पांढुर्ना विधानसभा के मुद्दे

हर बार चुनाव से पहले जनप्रतिनिधि पांढुर्ना की जनता से वोट के बदले विकास के दावे तो खूब करते हैं..लेकिन चुनाव के बाद क्षेत्र की जनता के हिस्से केवल दुश्वारियां ही आती हैं…पांढुर्ना में हमेशा की तरह आने वाले चुनाव में भी यहां पानी और बिजली का मुद्दा जमकर गूंजने वाला है …न जाने क्यों इस मुद्दे पर सियासी दल और उनके नेता सिर्फ बातें ही करते नजर आते हैं

गोटमार मेले के लिए मध्यप्रदेश और पूरे देश में प्रसिद्ध पांढुर्ना में सबसे ज्यादा आबादी आदिवासी किसानों की रहती  है। जिनके विकास के दावे तो हर चुनाव में पार्टियां करती है…लेकिन धरातल पर विकास नजर नहींआता..यहां रहने वाले आदिवासियो की सबसे बड़ी परेशानी पानी और बिजली की है..क्षेत्र की जनता बिजली केवल किसी सरकारी कार्यक्रम या चुनावी रैली में ही देख पाते हैं..पांढुर्ना विधानसभा में 90 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है..कपास और अरहर जैसी महंगी फसलों की यहां बंपर पैदावार है बावजूद इसके पांढुर्ना विधानसभा के आदिवासी किसान मूलभूत सुविधाओं के लिए मोहताज है।

इलाके की समस्याओं की बात करें तो पानी की समस्या गंभीर नजर आती है यहां के लोगों को 4 दिन में एक बार ही पानी मिल पाता है.. आने वाले चुनाव में पानी के मुद्दे को लेकर नेताओँ को जनता के सवालों का जवाब देना होगा।

इसके अलावा रोजगार के अभाव में  क्षेत्र के युवा पलायन के लिए मजबूर हैं..कई सालों से कृषि महाविद्यालय की मांग पर भी सरकार ने कोई काम नहीं किया..यहां के आदिवासी कई सालों से वनाधिकार पट्टे की मांग कर रहे हैं लकिन वो भी अब तक पूरी नहीं हो पाई है। पांढ़ुर्ना में विधायक की निष्क्रियता भी बड़ा मुद्दा है।

रतलाम ग्रामीण विधानसभा की भौगोलिक स्थिति

अब बात मध्यप्रदेश की रतलाम ग्रामीण विधानसभा सीट की

रतलाम लोकसभा क्षेत्र में आती है सीट

2008 से ST वर्ग के लिए है आरक्षित 

इलाके की 80 फीसदी जनता कृषि पर निर्भर

जनसंख्या- करीब 2 लाख से अधिक

कुल मतदाता- 1 लाख 80 हजार 

पुरुष मतदाता- 91 हजार 500

महिला मतदाता- 88 हजार 500

सीट पर जाति समीकरण है खास

आदिवासी मतदाता-  36 हजार

ओबीसी मतदाता- 70 हजार

दलित मतदाता- 18 हजार

सामान्य मतदाता- 50 हजार

वर्तमान में सीट पर बीजेपी का कब्जा

मथुरालाल डामर हैं बीजेपी विधायक 

मथुरालाल डामर हैं बीजेपी विधायक 

रतलाम ग्रामीण विधानसभा की सियासत

रतलाम जिले में जाने वाली इस सीट की सियासत की बात करें तो…पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश को समेटे इस सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है…मथुरालाल डामर यहां के वर्तमान विधायक हैं..मथुरालाल एक बार फिर बीजेपी से टिकट पाने के लिए सक्रिय हो गए हैं..हालांकि पार्टी में कई नेता उनके लिए चुनौती बन सकते हैं..वहीं कांग्रेस में भी दावेदारों की लंबी लिस्ट है…ऐसे में रतलाम ग्रामीण सीट पर इस बार सियासी घमासान होना तय है। 

रतलाम ग्रामीण विधानसभा..जैसा नाम वैसी तासिर..रतलाम जिले में आने वाली इस सीट की 95 फीसदी एरिया ग्रामीण परिवेश को समेटे हुए है..1977 में अस्तित्व में आई इस सीट पर 2 नगर परिषद नामली और धामनोद हैं..2008 में परिसीमन के बाद रतलाम ग्रामीण एसटी वर्ग के लिए आरक्षित है… 1998 तक ये सीट कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था..लेकिन उसे बाद यहां की जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बारी-बारी से मौका दिया है..फिलहाल रतलाम ग्रामीण विधानसभा सीट पर भाजपा के मथुरालाल डामर हैं..जो 2013 के विधानसभा चुनाव में बड़े अंतर से कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मी देवी खराड़ी को बड़े अंतर से हराय था। अब जब कुछ महीनों में चुनाव होना है तो दोनों पार्टियों में दावेदारों की लंबी कतार हैं..भाजपा के संभावित उम्मीदवारों की बात करें तो 

वर्तमान विधायक मथुरालाल डामर एक बार फिर से टिकट पाने की दौड़ में सबसे आगे नजर आ रहे हैं।  हालांकि स्थानीय कार्यकर्ताओ कीं नाराजगी और परफॉर्मेंस खराब रहने से टिकिट पर संशय बना हुआ है …. भाजपा से दिलीप मकवाना भी दावेदार है जो संघ से जुड़े हुए है ..इसके अलावा  जिला पंचायत अध्यक्ष परमेश मेढ़ा भी टिकट के दावेदार हैं … वही कांग्रेस से कोमल धुर्वे प्रबल दावेदार है…कोमल पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष रह चुकी है …वहीं किशन सिंघाड़ और थावर भूरिया भी कांग्रेस से टिकट पाने के लिए सक्रिय हैं 

कुल मिलाकर दोनों दलों में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है …और सब अपने अपने गणित भी फिट कर रहे हैं टिकट पाने के लिए।

रतलाम ग्रामीण विधानसभा के मुद्दे

रतलाम ग्रामीण विधानसभा में मुद्दों की बात करें तो हर चुनाव में  विकास के अलावा यहां आदिवासियों और किसानों से जुड़े मुद्दे ही हावी रहे है… चुनाव नजदीक आते ही एक बार फिर पुराने मुद्दे नए रूप में फिर से खड़े हो जाते है…आइये जानते है क्या है यहां के प्रमुख मुद्दे और समस्याएं

रतलाम ग्रामीण विधानसभा में विकास के वादे और दावे तो किए गए लेकिन सच यही है कि आज भी बुनियादी सुविधाओं तक के लिए तरस रहा है रतलाम ग्रामीण विधानसभा..यहां 80 फीसदी मतदाता आदिवासी किसान है या खेती से जुड़े है…लेकिन इन किसानों की शिकायत है कि इन्हें उनके फसल का सही कीमत नहीं मिलती..पिछले साल प्याज की बम्पर पैदावार से परेशानी में पड़ा किसान अब लहसून की लागत नहीं मिलने से नाराज है….भावान्तर योजना के लागू होने के बावजूद किसानों से ज्यादा बिचोलिये लाभ कमा रहे है ..ऊपर से समर्थन मूल्य पर गेंहू खरीदी में भी किसानों को लंबा इन्तजार करना पड़ रहा है …क्षेत्र में उद्योग नहीं होने से रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर है ग्रामीण ….23 गांवों की पेयजल समस्या के लिए 28 करोड़ की गुणावद डेम योजना मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद धरातल पर नहीं आ सकी है …शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी पिछड़ा हुआ है इलाका….अवैध शराब का कारोबार यहां पुलिस थानों के सरंक्षण में जमकर फल-फूल रहा है.. वहीं क्षेत्र की युवा पीढ़ी नशे में बर्बाद हो रही है। 

 

 

वेब डेस्क, IBC24


लेखक के बारे में