लखनऊ, 21 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर का विवाह प्रमाणपत्र अपने आप में किसी हिंदू शादी की वैधता को स्थापित नहीं करता।
न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के अधिकारी रोहित पांडेय की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की, जिन्हें अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत घोषणा करने के आरोप में सेवा से निष्कासित कर दिया गया था।
अदालत ने 28 अप्रैल 2022 के निष्कासन आदेश को चुनौती देने वाली पांडेय की याचिका पर सुनवाई की।
पांडेय के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई सुचेता तिवारी की शिकायत पर की गई थी। सुचेता ने दावा किया था कि पांडेय ने वर्ष 2007 में एक आर्य समाज मंदिर में उससे शादी की थी।
अधिकारियों ने इस कथित विवाह को वैध माना और निष्कर्ष निकाला कि पांडेय ने बाद में झूठी घोषणा की थी कि सेवा में आने के समय वह अविवाहित थे।
पांडेय ने दलील दी थी कि आवश्यक हिंदू विवाह समारोह आयोजित किए जाने का कोई सुबूत नहीं था।
उन्होंने एक संबंधित आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुचेता की ओर से दी गई गवाही का भी हवाला दिया, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं हुई थी।
हालांकि, अधिकारियों ने विभागीय जांच पर भरोसा किया, जिसमें सुचेता ने कहा कि शादी अगस्त 2007 में एक आर्य समाज मंदिर में हुई थी।
मंदिर के पुजारी ने भी कहा था कि शादी उनकी उपस्थिति में संपन्न हुई थी और अधिकारियों के समक्ष नोटरी प्रमाण पत्र भी पेश किए गए थे।
उच्च न्यायालय ने ‘प्रिया बाला घोष बनाम सुरेश चंद्र घोष’ (1971) मामले में शीर्ष अदालत की ओर से हिंदू विवाह को स्थापित करने के लिए जरूरी समारोहों की आवश्यकता को रेखांकित करने वाले फैसले का जिक्र किया।
अदालत ने कहा, “केवल आर्य समाज मंदिर के किसी प्रमाणपत्र के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार संपन्न हुआ था।”
उच्च न्यायालय ने माना कि अपेक्षित हिंदू समारोहों की अनुपस्थिति के बारे में शिकायतकर्ता के खुद के बयान को ध्यान में रखते हुए 2007 की कथित शादी को “कानून की नजर में” विवाह के तौर पर नहीं माना जा सकता, नतीजतन यह पांडेय को सेवा के लिए अनुपयुक्त ठहराने या उन्हें बर्खास्त करने का आधार नहीं बन सकता।
अदालत ने पांडेय के निष्कासन आदेश को रद्द करते हुए अधिकारियों को उन्हें तुरंत ड्यूटी बहाल करने की अनुमति देने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि 28 अप्रैल 2022 से फैसले की तारीख तक की अवधि को ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के आधार पर मान्य माना जाएगा, लेकिन इससे पांडेय की सेवा में कोई रुकावट नहीं आएगी।
भाषा
सं. सलीम पारुल
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