केजीएमयू में मांसाहारी भोजन पकाने पर रोक से खड़ा हुआ सियासी विवाद

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केजीएमयू में मांसाहारी भोजन पकाने पर रोक से खड़ा हुआ सियासी विवाद

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  • Publish Date - July 15, 2026 / 08:42 PM IST,
    Updated On - July 15, 2026 / 08:42 PM IST

लखनऊ, 15 जुलाई (भाषा) लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के छात्रावास परिसर में मांसाहारी भोजन पकाने पर रोक लगाने के फैसले से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।

विपक्षी दलों ने इस कदम को ‘तानाशाहीपूर्ण’ और ‘असंवैधानिक’ बताया है, वहीं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने दावा किया कि यह निर्णय भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया होगा।

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान कई चिंताएं जताई थीं, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मांसाहार पकाने पर पाबंदी लगाने की मंगलवार को अधिसूचना जारी की।

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया कि छात्र अब भी बाहर से मांसाहारी भोजन मंगा सकते हैं।

समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने बुधवार को फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे ‘तुगलकी फरमान’ बताया।

उन्होंने कहा, ”क्या राज्यपाल आनंदीबेन पटेल पश्चिम बंगाल में मछली-भात खाने वाले भाजपा सांसदों के लिए कोई आदेश जारी करेंगी? आपकी विचारधारा उत्तर प्रदेश में आने के बाद ही बदलती है।”

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता अंशू अवस्थी ने भी इस आदेश को ‘तानाशाहीपूर्ण’ बताते हुए कहा कि भाजपा को नागरिकों की खान-पान की आदतों या जीवनशैली में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने कहा कि एक ऐसे देश में जो दुनिया के अग्रणी मांस निर्यातकों में शामिल है, छात्रों को मांसाहारी भोजन पकाने से रोकना सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के रुख में विरोधाभास को जाहिर करता है।

अवस्थी ने यह सवाल भी किया कि भाजपा नेताओं ने कुछ क्षेत्रों में गोमांस खाने का समर्थन करने वाले अपने ही कुछ नेताओं के बयानों पर टिप्पणी क्यों नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की यह नीति लोगों पर भोजन की पसंद थोपने जैसी है।

इस बीच, केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने इस मुद्दे पर लखनऊ में संवाददाताओं से कहा, ”मेरा मानना है कि अगर ऐसा कोई निर्णय लिया गया है तो स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया होगा।”

इस मुद्दे पर धर्म गुरुओं ने मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है।

लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने केजीएमयू प्रशासन से आदेश वापस लेने की मांग की है।

उन्होंने कहा, ”भारत में 61 प्रतिशत से अधिक लोग मांसाहारी हैं। चिकित्सकीय नजरिये से मांसाहारी भोजन इंसान की सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है।”

हालांकि, शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि मामले का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, ”यह विश्वविद्यालय का फैसला है। इस पर किसी को टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है। अगर कोई मांसाहारी खाना खाना चाहता है तो वह बाहर जाकर खा सकता है। इसे राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।”

केजीएमयू के अधिकारियों ने बताया कि विश्वविद्यालय के 18 आधिकारिक छात्रावास मेस में मांसाहारी भोजन कभी भी व्यंजन सूची का हिस्सा नहीं रहा है।

उन्होंने कहा कि राज्यपाल द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद जारी की गयी सलाह का उद्देश्य छात्रों के समूहों द्वारा निजी तौर पर संचालित दो या तीन सहकारी भोजनालयों में मांसाहारी भोजन पकाने को रोकना था।

विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि छात्रों या छात्रावास में रहने वाले अन्य लोगों के बाहर से मांसाहारी भोजन मंगवाने पर कोई पाबंदी नहीं है।

भाषा सलीम जोहेब

जोहेब