नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने बुधवार को कहा कि जैविक खेती के लिए जरूरी चीजों – जैसे जैव-उत्प्रेरक से लेकर जैव-कीटनाशक तक – को बड़े पैमाने पर अपनाने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना को प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण झटका लग सकता है। उन्होंने बढ़ते जैव-विनिर्माण क्षेत्र को समर्थन देने के लिए तुरंत कौशल विकास के उपाय करने की बात कही।
उद्योग निकाय बायोलॉजिकल एग्री सॉल्यूशंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएएसएआई) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में सिंह ने कहा कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक बनाने में लगे कर्मचारियों को सीधे तौर पर जैविक संयंत्र में नहीं लगाया जा सकता।
उन्होंने कहा, ‘‘रासायनिक इंजीनियरों के पास शायद जैविक डिस्टिलेशन या फर्मेंटेशन (किण्वन) प्रणाली के लिए जरूरी विशेषज्ञता न हो।’’ उन्होंने इसे एक ढांचागत कमी बताया जिसे भारत के जैव-समाधानों से जुड़े बड़े लक्ष्यों को हासिल करने से पहले ठीक करना जरूरी है।
आयुक्त ने कहा कि सरकार को अब बारीकी से यह तय करना होगा कि इस क्षेत्र को किस तरह के कर्मचारियों की जरूरत होगी – कितने इंजीनियर, तकनीशियन और सहायक कर्मचारी चाहिए, उनके प्रशिक्षण के मॉड्यूल कैसे होने चाहिए, और कौन से संस्थान ये पाठ्यमक्रम करवाएंगे।
सिंह ने कहा, ‘‘ये कोई सैद्धांतिक सवाल नहीं हैं। कई नीतिगत मंच ने इन्हें उठाया है।’’ उन्होंने हाल के वर्षों में कृत्रिम मेधा दक्षता के लिए भारत द्वारा प्रशिक्षण पाइपलाइन तैयार करने का उदाहरण दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि यह तरीका जैव-क्षेत्र के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।
कर्मचारियों की यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब भारत प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रहा है। सिंह ने कहा कि भारतीय कृषि उत्पादों को आयात करने वाले देश इस क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ‘खेत बचाओ अभियान’ जैसी योजनाओं ने शुरू होने के एक महीने के भीतर ही 80 लाख किसानों तक पहुंच बना ली है। यह इस बात का प्रमाण है कि इस क्षेत्र में दबी मांग मौजूद है जिसे पूरा किया जा सकता है।
सिंह ने बताया कि दलहन, कपास और तिलहन से जुड़े सरकारी मिशन को अब इस तरह से फिर से तैयार किया गया है कि उनमें आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले रासायनिक के बजाय जरूरत के हिसाब से जैविक समाधान पर जोर दिया जाए। एसएफआईए (सॉल्यूबल फर्टिलाइजर इंडस्ट्री एसोसिएशन) और बीएएसएआई जैसे उद्योग संगठन जमीनी स्तर पर इस बदलाव में मदद कर रहे हैं।
भाषा राजेश राजेश अजय
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