लखनऊ, 23 जून (भाषा) उत्तर प्रदेश के लखनऊ के अलीगंज इलाके में एक इमारत में लगी भीषण आग में 15 लोगों की मौत के एक दिन बाद भवन की वैधता और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
पीड़ित परिवारों का कहना है कि अगर वर्ष 2016 में जारी ध्वस्तीकरण आदेश को लागू किया गया होता, तो इस घटना को रोका जा सकता था।
अलीगंज के सेक्टर-डी स्थित तीन मंजिला इमारत में सोमवार को लगी आग में 15 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि नौ अन्य लोग घायल हो गए थे।
मृतकों में 27 वर्षीय नीलेश भी शामिल था, जो इमारत की दूसरी मंजिल पर एक एनिमेशन सेंटर में कार्यरत था।
मार्टिन पुरवा निवासी नीलेश की चचेरी बहन काजल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि परिवार को इस बात की जानकारी नहीं थी कि भवन कथित तौर पर अवैध वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए उपयोग किया जा रहा था।
उन्होंने कहा, “अगर इस भवन के खिलाफ समय रहते कार्रवाई की गई होती, तो शायद नीलेश सहित 15 लोगों की जान बच सकती थी। भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए बेहतर प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।”
काजल ने बताया कि नीलेश का अंतिम संस्कार मंगलवार सुबह किया गया। अधिकारियों के अनुसार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने वर्ष 2016 में इस भवन के खिलाफ कथित अनधिकृत निर्माण के मामले में ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया था हालांकि, दो महीने से भी कम समय में यह आदेश निरस्त कर दिया गया।
प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि भवन को ध्वस्त करने के लिए नया नोटिस जारी किया गया है और साथ ही उन अधिकारियों की भूमिका की जांच भी शुरू कर दी गई है, जिनकी कथित लापरवाही के कारण भवन का लंबे समय तक वाणिज्यिक उपयोग जारी रहा।
उन्होंने बताया कि निर्माण संबंधी नियमों के उल्लंघन के मामले में जिम्मेदारी तय की जाएगी।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के राष्ट्रीय सह-संयोजक (मीडिया) अभिनव मिश्रा ने कहा कि यह हादसा प्रशासनिक विफलता, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और नियमों के अनुपालन में लापरवाही का परिणाम प्रतीत होता है।
एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव अभय प्रताप सिंह ने कहा, “जिस भवन को वर्ष 2016 में ध्वस्त किए जाने के लिए चिह्नित किया गया था, उसका वर्षों तक वाणिज्यिक उपयोग होता रहा और अंततः 15 लोगों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। यह जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”
स्थानीय निवासी हेमंत श्रीवास्तव ने भी रिहायशी क्षेत्रों में वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के संचालन पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि नियमों की अनदेखी कर आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति देना भविष्य में बड़े हादसों का कारण बन सकता है।
राज्य सरकार के अनुसार, भवन को 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार को आवंटित किया गया था।
वर्ष 2005 में यह भवन विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुआ, जिसे बाद में वर्ष 2013 में वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला व सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला ने खरीद लिया। करीब 1,992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाले इस भवन का मानचित्र वर्ष 2014 में आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
बाद में अनधिकृत निर्माण की शिकायत मिलने पर प्राधिकरण ने वर्ष 2016 में मामला दर्ज किया और 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण आदेश पारित किया।
हालांकि, पांच जुलाई 2016 को यह आदेश निरस्त कर दिया गया था।
हादसे के बाद अब भवन की वैधता, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर जांच तेज कर दी गई है।
भाषा सलीम जितेंद्र
जितेंद्र