गोरखपुर (उप्र), 15 फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भगवत ने भारत को सद्भावना और सामाजिक सामंजस्य का वैश्विक केंद्र बताते हुए रविवार को जोर देकर कहा कि देश की सभ्यतागत विचारधारा लेन-देन वाले संबंधों के बजाय एकता और आपसी जुड़ाव की भावना पर आधारित है। आरएसएस के मीडिया प्रकोष्ठ ने यह जानकारी दी।
आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में तारामंडल स्थित बाबा गंभीरनाथ सभागार में आयोजित ‘सामाजिक सद्भाव’ सम्मेलन को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि समाज की पहचान परस्पर जुड़ाव से होती है, न कि स्वार्थ से।
उन्होंने कहा, ‘कई देशों में रिश्तों को लेन-देन के रूप में देखा जाता है। हमारे देश में मानवीय रिश्ते अपनेपन की भावना पर आधारित हैं।’
भारत की विविधता पर प्रकाश डालते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा, “हम भारत को अपनी माता मानते हैं। वही दिव्य चेतना हम सब में निवास करती है। यही बंधन हमें हमारी भिन्न-भिन्न पहचानों के बावजूद एकजुट रखता है।”
उन्होंने कहा कि समाज को कायम रखने के लिए केवल कानून लागू करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक सद्भाव भी आवश्यक है।
आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि यह उपलब्धि जश्न मनाने का नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का विषय है।
उन्होंने सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए साल में दो से तीन बार खंड विकास स्तर की बैठकें आयोजित करने का आह्वान किया और समुदायों से जातिगत सरोकारों से परे व्यापक हिंदू समाज के लिए काम करने का आग्रह किया।
भागवत ने कहा, “समाज को स्वयं कार्रवाई करनी होगी। संघ सहायता करेगा, लेकिन जिम्मेदारी समाज की है।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने हमेशा स्वार्थहीन भाव से संकट के समय अन्य देशों की सहायता की है।
बैठक के दौरान विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा किए। बाद में भागवत ने उनके साथ सामुदायिक भोज में भाग लिया।
भाषा सं आनन्द नोमान
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