उप्र के सरकारी अस्पतालों, नए मेडिकल कॉलेजों में सुविधाओं की कमी पर अदालत ने चिंता जताई
उप्र के सरकारी अस्पतालों, नए मेडिकल कॉलेजों में सुविधाओं की कमी पर अदालत ने चिंता जताई
लखनऊ, नौ सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने एक नवजात शिशु की मौत के संबंध में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बुधवार को यह जानना चाहा कि क्या उत्तर प्रदेश में हाल में स्थापित अन्य मेडिकल कॉलेजों को भी आवश्यक चिकित्सा उपकरणों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने सुलतानपुर के राजकीय स्वायत्त मेडिकल कॉलेज में जन्मे एक नवजात की समय पर वेंटिलेटर, ऑक्सीजन युक्त बेड और विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण हुई मौत के मामले को गंभीरता से लिया है।
अदालत ने सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्थिति चिंता का विषय है।
अदालत ने जानना चाहा है कि प्रदेश में हाल में खोले गए अन्य मेडिकल कॉलेजों में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं और विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध हैं या नहीं। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को निर्धारित की है।
न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने मामले में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव, केजीएमयू के कुलपति, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक, एसजीपीजीआई के निदेशक अथवा उनके द्वारा नामित किसी जिम्मेदार चिकित्सक या अधिकारी तथा सुलतानपुर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को अगली सुनवाई के दिन यानी 11 सितंबर को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से जुड़ने का निर्देश दिया है।
अधिकारियों को अदालत में पेश होने से पहले याचिका में लगाए गए आरोपों और चिकित्सा सुविधाओं से संबंधित अदालत के पहले के आदेशों की जांच करने के लिए कहा गया है।
आशुतोष कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुलतानपुर के सरकारी स्वायत्त मेडिकल कॉलेज में जन्मे एक नवजात में जन्मजात जटिलताएं विकसित हुईं और उसे वेंटिलेटर और बाल रोग विशेषज्ञ की आवश्यकता थी। हालांकि, कॉलेज में कोई भी उपलब्ध नहीं था। लगभग तीन साल पहले इस मेडिकल कॉलेज को स्थापित किया गया था।
बाद में शिशु को केजीएमयू, आरएमएलआईएमएस और एसजीपीजीआई रेफर किया गया, लेकिन प्रत्येक अस्पताल में कथित तौर पर ऑक्सीजन युक्त या उपयुक्त बिस्तर उपलब्ध नहीं था। याचिका में कहा गया है कि नवजात की अंततः जन्म के 24 घंटे के भीतर मृत्यु हो गई।
सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की उपलब्धता पर चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा कि प्रसव कराने वाले नव स्थापित मेडिकल कॉलेजों में आपात स्थिति से निपटने के लिए आवश्यक उपकरण और विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए।
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या राज्य में हाल में खोले गए अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी इसी तरह की कमियां हैं और अधिकारियों को यह बताने का निर्देश दिया कि क्या पहले की कार्यवाही में सुझाए गए प्रभावी तंत्र को लागू किया गया है।
मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।
भाषा सं जफर सुरभि
सुरभि

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