लखनऊ, आठ अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने अधिकारियों के आचरण को ‘‘प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण’’ बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के एक दिवंगत वर्कचार्ज कर्मचारी को उस तारीख से नियमित मानने का निर्देश दिया, जिस दिन वह नियमितीकरण के लिए पात्र हुआ था।
वर्कचार्ज कर्मचारी, वे कर्मचारी होते हैं जिन्हें किसी विशेष निर्माण कार्य, परियोजना या रख-रखाव के काम के लिए रखा जाता है।
अदालत ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु से नियमितीकरण पर विचार का उसका अर्जित अधिकार समाप्त नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की एकल पीठ ने शुक्रवार को अधिकारियों को कर्मचारी के बेटे के मृतक आश्रित के रूप में नियुक्ति के दावे पर भी उत्तर प्रदेश सेवाकाल में मृत सरकारी सेवकों के आश्रितों की भर्ती नियमावली, 1974 के तहत विचार करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि पूरी प्रक्रिया आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने के दो महीने के भीतर पूरी की जाए।
मामला हसन अहमद की याचिका से जुड़ा है।
उनके पिता रिफाकत हुसैन को एक नवंबर 1985 को हरदोई में ग्रामीण अभियंत्रण विभाग की ‘वर्कचार्ज’ स्थापना में कनिष्ठ सहायक के पद पर नियुक्त किया गया था।
याचिका में बताया गया कि 11 अगस्त 2012 को उनकी मृत्यु हो गई और उस समय तक वह 18 वर्ष से अधिक सेवा कर चुके थे।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2005 में नियमितीकरण के लिए तैयार वरिष्ठता सूची में हुसैन का नाम 58वें स्थान पर था।
पीठ ने कहा कि वर्ष 2012 में दैनिक वेतन, वर्कचार्ज और न्यायालयीन मामलों से जुड़े कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए ग्रुप-सी के 172 पद स्वीकृत किए गए थे। हालांकि, नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही हुसैन की मृत्यु हो गई, जबकि उनके समान स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया।
पीठ ने पूर्व के निर्देशों के बावजूद कर्मचारी के दावे को बार-बार खारिज किए जाने पर अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि 17 मार्च 2023 का विवादित आदेश पूर्व के बाध्यकारी निर्देश की अवहेलना में पारित किया गया था और अधिकारियों के आचरण को ‘‘प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण’’ करार दिया।
पीठ ने कहा कि एक बार नियमितीकरण पर विचार का अधिकार बनने के बाद कर्मचारी की मृत्यु से वह केवल इस आधार पर समाप्त नहीं हो जाता कि नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उसकी मौत हो गई।
अदालत ने कहा कि ऐसा अधिकार उसके विधिक उत्तराधिकारियों के माध्यम से कायम रह सकता है।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों द्वारा उसके निर्देशों का बार-बार पालन नहीं किए जाने के कारण याचिकाकर्ता को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
पीठ ने याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये हर्जाने के रूप में देने का आदेश दिया।
भाषा सं आनन्द जितेंद्र
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