उप्र : फालैन गांव में इस बार भी प्रह्लाद रूप में जलती होली के बीच में से निकलेगा एक पण्डा
उप्र : फालैन गांव में इस बार भी प्रह्लाद रूप में जलती होली के बीच में से निकलेगा एक पण्डा
मथुरा, एक मार्च (भाषा) उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के फालैन गांव में हर साल की तरह इस बार भी प्रह्लाद रूप में एक पण्डा जलती होली के बीच में से निकलेगा।
फालैन में होलिका दहन तीन मार्च की सुबह करीब चार बजे (चंद्रग्रहण का सूतक प्रारंभ होने से पूर्व) किया जाएगा।
दिल्ली-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कोसीकलां-शेरगढ़ मार्ग पर पांच किलोमीटर दूर फालैन गांव में सदियों से होलिका दहन के अवसर पर ग्राम समाज का एक पण्डा (ब्राह्मण युवक) जलती होली में से सकुशल निकल कर दिखाता है।
ग्राम प्रधान कैलाश चौधरी ने रविवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि ब्राह्मण बहुल आबादी वाले फालैन गांव के ब्राह्मण समाज के लोग ही आपस में तय करते हैं कि इस वर्ष किस परिवार का युवक यह जिम्मेदारी उठाएगा।
उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से सुशील पण्डा का बेटा संजू पण्डा ही यह भूमिका निभा रहा है और इस बार भी उसने ही एक माह पूर्व यह व्रत शुरू किया था।
चौधरी ने बताया कि इससे पहले संजू के पिता सुशील पण्डा भी कई वर्षों तक जलती होली में से निकलने का ‘चमत्कार’ दिखाते रहे हैं।
उन्होंने बताया कि ग्राम समाज जलती होली से निकलने वाले पण्डा परिवार की अपनी ओर से पूरी मदद करता है तथा उसे वर्ष पर्यंत जीविकोपार्जन में मदद के लिए अपनी-अपनी फसल का एक हिस्सा दान में देता है।
चौधरी ने इस परंपरा से जुड़ी कुछ अन्य बातों का जिक्र करते हुए बताया कि जलती होली में से निकलने का इरादा करने वाले ब्राह्मण व्यक्ति को माघी पूर्णिमा से ही ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और वह दिन-रात प्रह्लाद मंदिर में ही रहता है तथा जमीन पर सोता है।
उन्होंने बताया कि वह अन्न का त्याग कर फल एवं दूध जैसे पदार्थों का ही सेवन करता है और नित्य प्रति साधना में व्यस्त रहता है।
चौधरी ने बताया कि होलिका दहन वाले दिन भी वह उसी प्रकार तपस्या करता रहता है और जब मध्य रात्रि पश्चात उसे मंदिर में भगवान प्रह्लाद के समक्ष जलाए गए दीपक की लौ जल के समान शीतल महसूस होने लगती है तब वह समझ जाता है कि उसके अग्नि में प्रवेश करने का समय हो गया है।
उन्होंने बताया कि उसके बाद वह निकट ही स्थित प्रह्लाद कुण्ड में स्नान करता है और केवल एक अंगवस्त्र लपेटे होली की लपटों के विशाल कुण्ड की ओर बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि इस बीच, उसकी बहन उसे जल छिड़क कर रास्ता दिखाती है और वह निडर होकर तकरीबन 20-25 फुट की परिधि में फैली व इतनी ही ऊंचाई तक उठती लपटों के बीच से इस प्रकार होकर गुजर जाता है।
चौधरी ने बताया कि जलती होलिका की दूसरी ओर उसके गुरु इंतजार कर रहे होते हैं, जो तुरंत उसे भीड़-भाड़ से दूर मंदिर में ले जाते हैं।
उन्होंने बताया कि इस बीच, होलिका के चहुंओर देश-विदेश से आए हजारों सैलानियों, श्रद्धालुओं और आस-पास की ग्राम पंचायतों के लोग इस अदृभुत लीला को साक्षात देखने का अनुभव करते हैं और ‘भक्त प्रह्लाद की जय’ के जयकारे लगाते हैं।
भाषा
सं, सलीम रवि कांत

Facebook


