बांग्लादेश के उच्चतम न्यायालय ने आईसीटी प्रमुख को विचाराधीन मामलों पर बोलने से बचने की नसीहत की

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बांग्लादेश के उच्चतम न्यायालय ने आईसीटी प्रमुख को विचाराधीन मामलों पर बोलने से बचने की नसीहत की

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  • Publish Date - September 8, 2026 / 07:38 PM IST,
    Updated On - September 8, 2026 / 07:38 PM IST

ढाका, आठ सितंबर (भाषा) बांग्लादेश के उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को देश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण(आईसीटी) के मुख्य अभियोजक को चेतावनी दी कि वे उन मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी न करें, जिनकी न्यायिक समीक्षा अभी लंबित है।

अभियोजक ने एक दिन पहले कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के पास अपनी मौत की सजा के खिलाफ अपील करने की कोई गुंजाइश नहीं है।

अदालत के एक अधिकारी ने कहा, “उच्चतम न्यायालय ने मुख्य अभियोजक (अमीनुल इस्लाम) को लंबित मामले पर मीडिया में खुले तौर पर बोलने के प्रति आगाह किया है और उनसे इस बारे में टिप्पणी करने से बचने को कहा गया है।”

इस्लाम ने अदालत की चेतावनी को स्वीकार करते हुए कहा, “अब से मैं पहले से कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।”

अदालत ने यह चेतावनी मौत की सजा पाए दोषी अबुल कलाम आजाद उर्फ बच्चू राजाकर की अपील पर सुनवाई के दौरान दी। आजाद ने आईसीटी-बांग्लादेश द्वारा उन्हें उनकी गैर-मौजूदगी में दी गई सजा के खिलाफ अपील की है।

चार सदस्यीय अपीलीय पीठ ने थोड़ी देर की सुनवाई के बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। इस्लाम सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए।

मुख्य अभियोजक ने सोमवार को कहा था कि न तो हसीना और न ही आजाद आईसीटी-बांग्लादेश के फैसलों को चुनौती दे सकते हैं। इसके बाद अदालत ने हस्तक्षेप किया।

इस्लाम ने अपने कार्यालय में पत्रकारों से कहा था, “शेख हसीना समेत जिन लोगों को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है और जिन्होंने फैसले के 30 दिन के अंदर अपील नहीं की है, उन्हें अब अपील करने का मौका नहीं मिलेगा।”

उन्होंने कहा था, “कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है, चाहे वह फरार मौलाना अबुल कलाम आजाद हों या पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई है।”

आजाद को 2013 में विशेष न्यायाधिकरण ने मौत की सजा सुनाई थी। यह आईसीटी-बांग्लादेश द्वारा दिया गया पहला फैसला था। न्यायिक कार्रवाई से बचने के लिए वह देश से भाग गए थे, लेकिन इस साल जनवरी में बांग्लादेश लौट आए।

उनके लौटने के बाद, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के गृह मंत्रालय ने उनकी फांसी पर “अस्थायी रोक” लगा दी थी। इसके बाद उन्होंने आईसीडी-बांग्लादेश के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

न्यायाधिकरण ने उन्हें जेल भेजने के बजाय फिलहाल बाहर रहने की अनुमति दी।

उनके वकीलों ने जुलाई में आईसीटी-बांग्लादेश की ओर से सुनाई गई मौत की सजा के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की अपीलीय पीठ में अपील दायर की। उन्होंने 30 दिन की तय समय-सीमा के बाद अपील दायर करने में हुई देरी के बारे में भी स्पष्टीकरण दिया।

आईसीटी-बांग्लादेश की स्थापना मूल रूप से बांग्लादेश के 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग करने के आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए की गई थी।

यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान न्यायाधिकरण ने हसीना पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुकदमा चलाया और उनकी गैर-मौजूदगी में उन्हें मौत की सजा सुनाई। पांच अगस्त 2024 को छात्रों के नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद हसीना की सरकार गिरा दी गई थी। इसके बाद वह भारत भाग गईं, जहां वह अब तक रह रही हैं।

भाषा जोहेब नरेश

नरेश

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