साल 2030 तक समुद्र के 30 फीसदी हिस्से के संरक्षण की मुहिम, सफलता का पैमाना सिर्फ क्षेत्रफल नहीं

साल 2030 तक समुद्र के 30 फीसदी हिस्से के संरक्षण की मुहिम, सफलता का पैमाना सिर्फ क्षेत्रफल नहीं

साल 2030 तक समुद्र के 30 फीसदी हिस्से के संरक्षण की मुहिम, सफलता का पैमाना सिर्फ क्षेत्रफल नहीं
Modified Date: June 17, 2026 / 02:58 pm IST
Published Date: June 17, 2026 2:58 pm IST

(कर्स्टन ग्रोरुड-कोलवर्ट, ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी और एना के. स्पाल्डिंग, स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन)

वाशिंगटन, 17 जून (द कन्वरसेशन) पृथ्वी पर मौजूद सबसे समृद्ध जैव विविधता में से कुछ समुद्र में पाई जाती है। प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव के जंगलों से लेकर गहरे समुद्र तक, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र अनगिनत प्रजातियों को सहारा देते हैं, तटीय समुदायों का आधार हैं, जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और वैश्विक खाद्य सुरक्षा की नींव को मजबूत करते हैं।

लेकिन मछली पकड़ने, प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का दबाव इन तंत्रों पर लगातार बढ़ रहा है।

इसकी प्रतिक्रिया में दुनिया के देशों ने 2030 तक विश्व के कम-से-कम 30 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र के संरक्षण का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपनाया है, जिसे ‘30×30’ के नाम से जाना जाता है। इस लक्ष्य के तहत दुनिया भर में समुद्री संरक्षण का दायरा बढ़ा है, खासकर समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (मरीन प्रोटेक्टेड एरिया) के रूप में।

लेकिन सवाल यह है कि किसी क्षेत्र को संरक्षित घोषित करने के बाद क्या होता है?

दशकों के अनुभव बताते हैं कि प्रभावी समुद्री संरक्षण के लिए स्पष्ट नियम-कानून, नियमित निगरानी, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और स्थानीय सरकारों, उद्योगों तथा समुदायों के साथ सार्थक सहयोग जरूरी है। इनके अभाव में ये क्षेत्र केवल कागजों पर संरक्षित रह जाते हैं। नक्शे पर खींची गई सीमाओं से आगे उनका कोई वास्तविक असर नहीं होता और अत्यधिक मछली पकड़ने समेत अन्य खतरों का दबाव समुद्री जीवन पर बना रहता है।

हमारे नेतृत्व में तैयार की गई दो नयी रिपोर्ट आज समुद्री संरक्षण की वास्तविक स्थिति और समुद्र के 30 प्रतिशत हिस्से के संरक्षण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक कदमों का एक महत्वपूर्ण आकलन प्रस्तुत करती हैं। इनमें एक रिपोर्ट ‘ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी’ की है जबकि दूसरी ‘स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की है।

इन दोनों रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि ‘30×30’ लक्ष्य को हासिल करने में अब सबसे बड़ी बाधा संरक्षण के प्रति महत्वाकांक्षा की कमी नहीं, बल्कि उसे धरातल पर उतारने के लिए प्रभावी उपायों की कमी है।

प्रतिबद्धताओं का एक दशक

वैश्विक समुद्री सम्मेलनों में लगातार ‘30×30’ लक्ष्य को बढ़ावा दिया जाता रहा है। इनमें 16 से 18 जून 2026 तक केन्या में आयोजित 11वां ‘आवर ओशन कॉन्फ्रेंस’ भी शामिल है।

ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार, ‘आवर ओशन कॉन्फ्रेंस’ के पिछले सम्मेलनों में की गई संरक्षण संबंधी घोषणाओं के कारण 38.8 लाख वर्ग मील (एक करोड़ वर्ग किलोमीटर) से अधिक समुद्री क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। यह वैश्विक समुद्री क्षेत्र का लगभग 2.8 प्रतिशत है।

कुल मिलाकर अब दुनिया के करीब 10 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया जा चुका है। हालांकि, इनमें से केवल लगभग 3.5 प्रतिशत क्षेत्र ही पूरी तरह या अत्यधिक स्तर पर संरक्षित हैं।

संरक्षित क्षेत्रों का यह विस्तार दर्शाता है कि यदि प्रगति की लगातार निगरानी की जाए और उसे सार्वजनिक किया जाए, तो स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएं भी ठोस संरक्षण परिणामों में बदल सकती हैं। हालांकि, रिपोर्ट यह भी बताती है कि संरक्षण के दायरे और उसकी प्रभावशीलता के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है।

दूसरे शब्दों में कहें तो समुद्री संरक्षण का आकलन केवल संरक्षित क्षेत्र के आकार के आधार पर नहीं किया जा सकता।

कार्यान्वयन की खाई

स्मिथसोनियन की रिपोर्ट इस बात की गहराई से पड़ताल करती है कि इन प्रतिबद्धताओं को प्रभावी संरक्षण में बदलने के लिए क्या आवश्यक है।

‘कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायो-डायवर्सिटी फ्रेमवर्क’ को 2022 में मंजूरी मिलने के बाद, लगभग सभी देशों ने पृथ्वी के कम-से-कम 30 प्रतिशत भूभाग और जल क्षेत्र के संरक्षण पर सहमति जताई थी। इसके बाद समुद्री संरक्षण का दायरा तेजी से बढ़ा है।

हालांकि, वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा समुद्री संरक्षित क्षेत्रों में से कम-से-कम आधे या तो पूरी तरह लागू नहीं हो पाए हैं या प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं। कई जगहों पर नियम-कानून ही नहीं हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में समुद्री तल पर बड़े जाल से मछली पकड़ने जैसी विनाशकारी गतिविधियों की भी अनुमति है।

अगले चार वर्षों में ‘30×30’ लक्ष्य हासिल करने के लिए समुद्र के अतिरिक्त 20 प्रतिशत हिस्से को संरक्षित करना होगा। चुनौती दोहरी है-एक ओर संरक्षण के दायरे का विस्तार करना और दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना कि इन क्षेत्रों से वास्तव में समुद्री जीवन और लोगों को लाभ पहुंचे।

प्रभावी और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए प्रबंधन योजनाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी, निगरानी व्यवस्था, कानून लागू करने की क्षमता, स्थायी वित्तीय संसाधन और समुदायों की भागीदारी आवश्यक है। इनके बिना केवल कानूनी दर्जा देने से जैव विविधता के संरक्षण, स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र और लोगों के कल्याण के लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते।

हालांकि, स्मिथसोनियन की रिपोर्ट एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। कई देशों में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार को लेकर उत्साह और महत्वाकांक्षा तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन इन क्षेत्रों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने और उन्हें वास्तव में सफल बनाने की क्षमता उसी गति से विकसित नहीं हो पाई है।

हमने इसके दो प्रमुख कारण पाए। पहला, क्षमता निर्माण को लेकर समन्वय की कमी। क्षमता निर्माण का अर्थ उन कौशलों और साधनों को विकसित करना है, जिनकी मदद से किसी लक्ष्य को प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सके। दूसरा कारण है-हर क्षेत्र के लिए एक जैसा मॉडल अपनाना, जबकि अलग-अलग क्षेत्रों की परिस्थितियां और जरूरतें अलग होती हैं।

कई देश और समुदाय समुद्री संरक्षण के प्रति प्रतिबद्ध हैं, लेकिन उन्हें दीर्घकालिक शासन व्यवस्था, बेहतर नीतियों, हितधारकों की भागीदारी, डेटा और प्रौद्योगिकी, सामाजिक एवं पारिस्थितिक समन्वय तथा प्रभावी संवाद की अधिक आवश्यकता है, ताकि संरक्षित समुद्री क्षेत्रों का लंबे समय तक प्रभावी संचालन किया जा सके।

इसी तरह, समुद्री संरक्षण के लिए धन जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। जब हमने समुद्री संरक्षण से जुड़े समूहों और समुदायों से बात की, तो उन्होंने बताया कि वित्तीय सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया काफी जटिल है और वित्तपोषण की मौजूदा व्यवस्था अक्सर उनकी स्थानीय जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं होती।

इससे संरक्षण के लिए धन उपलब्ध कराने और उसे धरातल पर लागू करने के बीच एक असंतुलन पैदा हो जाता है।

हालांकि, इस अंतर को कम करने के प्रयास भी हो रहे हैं। बाली स्थित ‘कोरल ट्रायंगल सेंटर’ की ‘कोरल ट्रायंगल इनिशिएटिव ऑन कोरल रीफ्स, फिशरीज एंड फूड सिक्योरिटी कैपेसिटी बिल्डिंग रोडमैप’ परियोजना पृथ्वी के सबसे समृद्ध समुद्री जैव विविधता वाले क्षेत्र में समुद्री संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है।

क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्रों, नेतृत्व कार्यक्रमों, इंटर्नशिप और डिजिटल मंचों के माध्यम से इस पहल ने अब तक 8,200 से अधिक सरकारी अधिकारियों, सामुदायिक नेताओं और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों को विज्ञान आधारित समुद्री संरक्षण के तौर-तरीकों का प्रशिक्षण दिया है।

वहीं, गैर-लाभकारी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के समूह ‘सस्टेनेबल फाइनेंस कोएलिशन’ ने अफ्रीका और दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर क्षेत्र में भूमि और समुद्र के महत्वपूर्ण प्रवासों की रक्षा के लिए धन जुटाने के नए तरीके विकसित किए हैं।

अब तक यह समूह 4.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि जुटा चुका है, जिसके जरिये 1,70,500 एकड़ (69,000 हेक्टेयर) क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्रभावी प्रबंधन में मदद मिली है।

सीमाओं से आगे

इन दोनों रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि समुद्री संरक्षण को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत है। सरकारें, आदिवासी समुदाय, स्थानीय लोग, वैज्ञानिक और संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं ‘30×30’ लक्ष्य के समर्थन में एकजुट हुई हैं और यह एक वैश्विक अभियान का रूप ले चुका है।

अब चुनौती इस गति को वास्तविक परिणामों में बदलने की है।

‘30×30’ योजना के संरक्षण संबंधी लक्ष्यों की सफलता अब नए संरक्षित क्षेत्रों की घोषणा पर कम और इस बात पर अधिक निर्भर करेगी कि मौजूदा तथा नए संरक्षित क्षेत्रों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए क्षमता निर्माण, पर्याप्त वित्तीय संसाधन, सुदृढ़ निगरानी व्यवस्था और दीर्घकालिक संस्थागत समर्थन में कितना निवेश किया जाता है।

जैसे-जैसे 2030 करीब आ रहा है, सबसे महत्वपूर्ण सवाल और स्पष्ट होता जा रहा है। अब मुद्दा केवल यह नहीं रह गया है कि समुद्र के कितने हिस्से को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि यह है कि क्या उस संरक्षण को वास्तविक, सतत और प्रभावी बनाया जा सकता है।

द कन्वरसेशन

खारी मनीषा

मनीषा


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