इंडोनेशिया में प्रवाल भित्तियां भीषण गर्मी को सहन कर सकती हैं, लेकिन एक हद तक : अध्ययन

इंडोनेशिया में प्रवाल भित्तियां भीषण गर्मी को सहन कर सकती हैं, लेकिन एक हद तक : अध्ययन

इंडोनेशिया में प्रवाल भित्तियां भीषण गर्मी को सहन कर सकती हैं, लेकिन एक हद तक : अध्ययन
Modified Date: June 8, 2026 / 05:58 pm IST
Published Date: June 8, 2026 5:58 pm IST

(ट्राइज ब्लैंडाइन रैजक, आईपीबी विश्वविद्यालय)

बोगोर, आठ जून (द कन्वरसेशन) इंडोनेशिया में दुनिया की सबसे बड़ी और जैव-विविधतापूर्ण प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) प्रणाली है, जो पूरे द्वीपसमूह में 32,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली हुई है। दुनिया के दूसरे हिस्सों की तरह यहां की प्रवाल भित्तियां भी समुद्र के बढ़ते तापमान का असर झेल रही हैं।

प्रवाल भित्तियां समुद्र में बनने वाली संरचनाएं होती हैं, जिन्हें कोरल नामक छोटे-छोटे समुद्री जीव बनाते हैं। ये जीव कैल्शियम से कठोर ढांचा बनाते हैं और हजारों वर्षों में मिलकर विशाल चट्टान जैसी संरचनाएं तैयार कर देते हैं।

हालांकि, हमारे नए अध्ययन में पता चला कि समुद्र के तापमान में वृद्धि के बावजूद इंडोनेशिया में अध्ययन में शामिल अधिकांश स्थानों पर लंबे समय में प्रवाल आवरण (कोरल कवर) आश्चर्यजनक रूप से स्थिर बना रहा।

हमारे अध्ययन में इंडोनेशिया के अलग-अलग हिस्सों में कई वर्षों तक प्रवाल भित्तियों की निगरानी के जरिये जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। वर्ष 2004 से 2023 के बीच एकत्र किए गए इन आंकड़ों में 32 स्थानों पर मौजूद 394 स्थायी प्रवाल भित्ति स्थलों की जानकारी शामिल है।

बत्तीस स्थान में से 26 में कठोर प्रवाल आवरण में कोई महत्वपूर्ण समग्र बदलाव नहीं देखा गया, दो स्थानों पर इसमें वृद्धि हुई और चार स्थान पर गिरावट दर्ज की गई।

सबसे अहम बात यह है कि यह स्थिरता बनी रही, जबकि अध्ययन में शामिल क्षेत्रों में 1985 से 2023 के बीच समुद्र की सतह का तापमान काफी बढ़ गया था। सबसे भीषण गर्मी पूर्वी इंडोनेशिया में दर्ज की गई।

हालांकि, यह निश्चित रूप से अच्छी खबर है, लेकिन इसके साथ एक बड़ी चेतावनी भी जुड़ी है। स्थिरता का मतलब सुरक्षा नहीं है। यदि तापीय दबाव (हीट स्ट्रेस) बहुत अधिक या बहुत बार होने लगे, तो प्रवालों का नुकसान तेज़ी से बढ़ सकता है।

यहां तक कि सबसे मजबूत प्रवाल भित्तियों की भी एक सीमा होती है, जिसके बाद वे बदलने लगती हैं।

हमने जो स्थिरता देखी, वह काफी हद तक इस बात पर आधारित है कि भित्ति ने 2010 और 2016 जैसी भीषण गर्मी से जुड़ी घटनाओं पर कैसी प्रतिक्रिया दी थी।

हालांकि इन घटनाओं में कई जगहों पर प्रवाल सफेद हो गए और नष्ट भी हुए, लेकिन संभव है कि ये घटनाएं उस अभूतपूर्व तापीय दबाव को पूरी तरह न दर्शाती हों, जिसका सामना अब भित्ति करना शुरू कर रहे हैं।

इसलिए हमारे निष्कर्षों का यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि इंडोनेशिया की प्रवाल भित्तियां जलवायु परिवर्तन के बीच सुरक्षित हैं। कई भित्ति अब तक गर्मी के दबाव को झेलती रही हैं, लेकिन लगातार बढ़ती और अधिक भीषण गर्मी इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों को ऐसी स्थिति में पहुंचा सकती है, जहां से उनकी बहाली संभव न हो।

दुनिया भर में समुद्री ऊष्ण लहरें (मरीन हीटवेव) और अधिक विकराल होती जा रही हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) ने चौथी वैश्विक प्रवाल विरंजन (ब्लीचिंग) को अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि जनवरी 2023 से सितंबर 2025 के बीच इतनी ज्यादा गर्मी पड़ी कि दुनिया की लगभग 84.4 प्रतिशत प्रवाल भित्तियां प्रभावित हुईं।

इंडोनेशिया भी इस वैश्विक प्रभाव से बच नहीं पाया। वर्ष 2023 से 2025 के बीच समुद्री ऊष्ण लहरों के कारण उत्तरी जकार्ता, मध्य जावा के करिमुनजावा और राजा अम्पात के डैम्पियर जलडमरूमध्य समेत कई जगहों पर भित्तियों की ब्लीचिंग की घटनाएं देखी गईं।

जब हमने प्रवाल की मात्रा में बदलाव को गर्मी के असर से मिलाकर देखा, तो पाया कि कम से मध्यम गर्मी में प्रवाल ठीक बने रहे, लेकिन जैसे ही यह गर्मी एक अहम सीमा लगभग 12 डिग्री-हीटिंग वीक (डीएचडब्ल्यू) से ज्यादा हो गई, प्रवाल तेजी से कम होने लगे।

डीएचडब्ल्यू एक माप है, जिससे पता चलता है कि समुद्र का पानी सामान्य से कितना ज्यादा गर्म है और कितने समय तक गर्म रहता है। इसे आसान भाषा में प्रवाल भित्तियों के लिए “कुल गर्मी का असर” समझ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, 12 डीएचडब्ल्यू का मतलब हो सकता है कि पानी 12 हफ्तों तक सामान्य से एक डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा हो, या छह हफ्तों तक दो डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा हो।

हमारे अध्ययन में पाया गया कि जब तापीय दबाव 12 डीएचडब्ल्यू से ऊपर पहुंचा, तो प्रवाल को नुकसान की संभावना काफी बढ़ गई। दूसरे शब्दों में, इंडोनेशिया की कई प्रवाल भित्तियां मध्यम स्तर का तापीय दबाव सहन कर सकती हैं, लेकिन इसकी भी एक सीमा है।

अगर इंडोनेशिया अपनी प्रवाल भित्तियों को सही तरीके से बचाना चाहता है, तो उसे उनकी निगरानी के लिए एक मजबूत और अच्छी राष्ट्रीय योजना बनानी होगी।

इस योजना में सिर्फ यह देखना काफी नहीं होगा कि कितने प्रवाल बचे हैं, बल्कि यह भी देखना जरूरी होगा कि ब्लीचिंग कितनी गंभीर है, कितने प्रवाल नष्ट हो रहे हैं, कितने ठीक हो रहे हैं, नए प्रवाल कितने बन रहे हैं और पूरे समुद्री वातावरण में क्या बदलाव आ रहे हैं।

आसान शब्दों में कहें तो पूरी स्थिति को समझना जरूरी है।

आने वाले समय में समुद्र का तापमान और बढ़ सकता है। ऐसे में इंडोनेशिया की प्रवाल भित्तियों का भविष्य सिर्फ उनकी अपनी सहनशीलता पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि हम उनके लिए अनुकूल माहौल कितना बचा पाते हैं, ताकि वे दोबारा ठीक हो सकें और जीवित रह सकें।

(द कन्वरसेशन) जोहेब सुरेश

सुरेश


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