पृथ्वी का सबसे पुराना ज्ञात क्रेटर तीन अरब वर्ष से भी अधिक पुराना, नए अध्ययन में पुष्टि हुई
पृथ्वी का सबसे पुराना ज्ञात क्रेटर तीन अरब वर्ष से भी अधिक पुराना, नए अध्ययन में पुष्टि हुई
( क्रिस किर्कलैंड, कर्टिन यूनिवर्सिटी )
पर्थ, 24 जून (द कन्वरसेशन) पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पिलबारा क्षेत्र में स्थित प्राचीन चट्टानों पर किए गए एक नए अध्ययन में पुष्टि हुई है कि पृथ्वी पर ज्ञात सबसे पुराना क्रेटर 3.024 अरब वर्ष से अधिक पुराना है।
कर्टिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक क्रिस किर्कलैंड के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि उत्तरी ध्रुव के झुकाव वाले क्षेत्र में मौजूद भूगर्भीय संरचना एक विशाल उल्कापिंड टक्कर का परिणाम है, जो आर्कियन काल (4 से 2.5 अरब वर्ष पूर्व) में हुई थी।
इस क्षेत्र की चट्टानें लगभग 3.5 अरब वर्ष पुरानी ज्वालामुखीय चट्टानें हैं, जिनमें ‘शॉटर कोन्स’ पाए गए हैं। ये संरचनाएं अत्यधिक दबाव और झटके का संकेत देती हैं, जो किसी उल्कापिंड के टकराने से उत्पन्न होते हैं।
शोधकर्ताओं ने इन चट्टानों के भीतर मौजूद सूक्ष्म खनिजों का विश्लेषण कर उनकी आयु निर्धारित की। विशेष रूप से जिरकॉन के क्रिस्टलों में यूरेनियम-सीसा डेटिंग तकनीक का उपयोग किया गया।
यह तकनीक रेडियोधर्मी क्षय के सिद्धांत पर आधारित होती है और अत्यंत प्राचीन घटनाओं की सटीक आयु निर्धारित करने में सहायक होती है।
अध्ययन में पाया गया कि कुछ जिरकॉन क्रिस्टल 3.4 अरब वर्ष से भी पुराने थे, जो संभवतः उस प्राचीन चट्टान का हिस्सा थे जिस पर उल्कापिंड का प्रभाव पड़ा था। वहीं कुछ अन्य जिरकॉन अत्यधिक विकृत और “स्केलेटल” संरचना वाले पाए गए, जिनकी आयु लगभग 3 अरब वर्ष आंकी गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन क्रिस्टल की संरचना में टक्कर के समय बनी तीव्र ऊष्मा और दबाव के कारण यह बदलाव हुआ होगा।
इसके अतिरिक्त, एपेटाइट नामक एक अन्य खनिज का भी विश्लेषण किया गया। यह खनिज गर्म द्रवों के प्रवाह के दौरान बनता है जो अक्सर उल्कापिंड की टक्कर के बाद उत्पन्न होती भूगर्भीय परिस्थितियों का परिणाम होता है। एपेटाइट की डेटिंग ने भी लगभग 3.02 अरब वर्ष पुरानी घटना की पुष्टि की।
इन दो अलग-अलग खनिजीय “घड़ियों”—जिरकॉन और एपेटाइट—ने एक ही समय अवधि की ओर संकेत किया, जिससे यह निष्कर्ष और मजबूत हुआ कि उत्तरी ध्रुव के झुकाव वाले हिस्से में उल्कापिंड टक्कर लगभग 3.024 अरब वर्ष पहले हुई थी।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इतने प्राचीन क्रेटर पृथ्वी पर बहुत कम संरक्षित रह पाए हैं। पृथ्वी की सतह निरंतर भूगर्भीय गतिविधियों—जैसे प्लेट टेक्टॉनिक्स, क्षरण, तापीय परिवर्तन और चट्टानों के पुनर्चक्रण—के कारण लगातार बदलती रहती है। इसके परिणामस्वरूप अधिकतर प्राचीन क्रेटर समय के साथ नष्ट हो जाते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि इस क्षेत्र की चट्टानों में बाद की भूगर्भीय घटनाओं के भी प्रमाण मौजूद हैं। लगभग 1.66 अरब वर्ष पुराने खनिजीय परिवर्तन यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में टक्कर के बाद भी भूगर्भीय गतिविधियां जारी रहीं। हालांकि ये परिवर्तन मूल टक्कर की आयु को प्रभावित नहीं करते, बल्कि बाद के भूगर्भीय इतिहास को दर्शाते हैं।
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को “डीप टाइम” यानी गहरे भूगर्भीय समय की अवधारणा को समझने में महत्वपूर्ण बताया है। यह अवधारणा बताती है कि पृथ्वी का इतिहास अरबों वर्षों में फैला हुआ है और मानव इतिहास इसकी तुलना में अत्यंत छोटा है।
वैज्ञानिकों ने यह भी समझाया कि चट्टानें पृथ्वी के इतिहास के पन्नों की तरह हैं, जिन्हें पढ़कर ग्रह के अतीत को समझा जा सकता है। लेकिन अत्यंत प्राचीन चट्टानों में यह कार्य कठिन होता है, क्योंकि वे समय के साथ विकृत और परिवर्तित हो जाती हैं।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि जब प्रत्यक्ष भूगर्भीय परतों से समय निर्धारण कठिन हो जाता है, तब खनिजों के भीतर मौजूद सूक्ष्म रेडियोधर्मी घड़ियाँ अतीत की घटनाओं का सटीक समय बताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उत्तरी ध्रुव के झुकाव वाले हिस्से में पाए गए प्रमाण यह दर्शाते हैं कि पृथ्वी पर अब तक ज्ञात सबसे पुराना क्रेटर 3.024 अरब वर्ष पहले बना था। यह खोज न केवल पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि हमारे ग्रह के शुरुआती दौर में अंतरिक्ष से आने वाले पिंडों का प्रभाव कितना गहरा और महत्वपूर्ण रहा होगा।
द कन्वरसेशन
मनीषा नरेश
नरेश

Facebook


