क्या स्किनकेयर रूटीन का जुनून शरीर की छवि से जुड़ी समस्या का संकेत है?
क्या स्किनकेयर रूटीन का जुनून शरीर की छवि से जुड़ी समस्या का संकेत है?
( जेमा शार्प, एडिलेड यूनिवर्सिटी )
एडिलेड, 18 सितंबर (द कन्वरसेशन) मात्र 12 साल की एक बच्ची “गेट रेडी विद मी” वीडियो देखती है। इसके बाद वह रेटिनॉल सीरम, एक्सफोलिएटिंग एसिड और “एंटी-एजिंग” उत्पादों को अपने ऑनलाइन शॉपिंग कार्ट में जोड़ देती है।
एक वयस्क व्यक्ति बार-बार मैग्नीफाइंग मिरर में अपने रोमछिद्रों को देखता है। फिर “ग्लास स्किन” का वादा करने वाले हर नए उत्पाद को खरीद लेता है और अगर रात का अपना स्किनकेयर रूटीन पूरी नहीं कर पाता तो बेचैन हो जाता है।
स्किनकेयर आनंददायक, रचनात्मक और सुकून देने वाली आदत हो सकती है। लेकिन पता ही नहीं चल पाता और यह चिंता का विषय बन जाती है।
“कॉस्मेटिकोरैक्सिया” एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल बेदाग त्वचा पाने की अत्यधिक या बाध्यकारी चिंता के लिए किया जाता है। इसे कभी-कभी “डर्मोरेक्सिया” भी कहा जाता है।
इसमें बहुत जटिल स्किनकेयर रूटीन अपनाना, बार-बार उत्पाद खरीदना, उम्र के लिहाज से अनावश्यक या अनुपयुक्त सामग्री अथवा कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करना शामिल हो सकता है। ऐसे लोग अपना रूटीन पूरा न कर पाने पर परेशान हो सकते हैं।
कॉस्मेटिकोरैक्सिया कोई मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी निदान नहीं है। इस शब्द को परिभाषित करने वाला प्रमुख अकादमिक लेख बड़े स्तर के अध्ययन के बजाय एक संपादकीय है।
इसलिए हर लंबे स्किनकेयर रूटीन को चिकित्सकीय समस्या मानने से बचना चाहिए।
चूंकि कॉस्मेटिकोरैक्सिया अभी स्थापित अवधारणा नहीं है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि यह अलग समस्या है या नहीं, इसे कैसे मापा जाए और यह कितनी आम है।
एक छोटे अध्ययन में कई फिलर प्रक्रियाएं करा चुके 217 त्वचा रोगियों में से 18 लोगों (करीब आठ प्रतिशत) में “कॉस्मेटिकोरैक्सिया के लक्षण” पाए गए। हालांकि, यह सीमित समूह पूरे समाज, किशोरों या वयस्कों में इसकी व्यापकता नहीं बताता।
किसी भी उम्र या लिंग के लोगों में अपनी शक्ल-सूरत को लेकर चिंता पैदा हो सकती है लेकिन मौजूदा चर्चा का बड़ा हिस्सा किशोर लड़कियों और कम उम्र के बच्चों पर केंद्रित है। सोशल मीडिया पर उन्हें जटिल स्किनकेयर रूटीन, बढ़ती उम्र रोकने वाले संदेशों और प्रभावशाली लोगों के प्रचार का सामना करना पड़ता है, जबकि इसी समय उनकी पहचान और शरीर की छवि विकसित हो रही होती है।
शोध में पाया गया है कि ऑनलाइन दूसरों की शक्ल-सूरत से अपनी तुलना करना शरीर की छवि को लेकर चिंता और खाने से जुड़ी समस्याओं के लक्षणों से जुड़ा हो सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि केवल सोशल मीडिया ही कॉस्मेटिकोरैक्सिया का कारण है। पूर्णतावाद, चिंता, त्वचा संबंधी समस्याएं, डराना-धमकाना, परिवार का नजरिया, विज्ञापन और सुंदरता की सामाजिक धारणाएं भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं।
इसके नुकसान भी हैं। रेटिनॉइड, एक्सफोलिएटिंग एसिड और अन्य सक्रिय सामग्री को एक साथ इस्तेमाल करने से त्वचा की सुरक्षा परत प्रभावित हो सकती है और सूजन, धूप के प्रति संवेदनशीलता या एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
2025 के एक अध्ययन में टिकटॉक के 100 वीडियो का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि 7 से 18 साल की लड़कियों द्वारा दिखाए गए स्किनकेयर रूटीन में औसतन छह उत्पाद शामिल थे। इनकी औसत लागत 168 अमेरिकी डॉलर थी। इनमें अक्सर त्वचा में जलन पैदा करने वाली सामग्री शामिल थी और दिन के समय इस्तेमाल किए जाने वाले रूटीन में केवल 26 प्रतिशत सनस्क्रीन शामिल थी।
“परफेक्ट” त्वचा पाने की कोशिश लोगों को अपनी तुलना दूसरों से करने, अपनी त्वचा से असंतुष्ट होने और बार-बार उसकी जांच करने के लिए बाध्य कर सकती है।
यह ‘बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर’ जैसी स्थितियों से भी जुड़ सकता है, जिसमें व्यक्ति अपनी शक्ल-सूरत की कथित कमियों को लेकर अत्यधिक चिंतित रहता है और बार-बार कुछ अलग व्यवहार दोहराता है।
बाथरूम की अलमारी में रखे उत्पादों की संख्या से किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का पता नहीं चलता। लेकिन कुछ चेतावनी संकेत हो सकते हैं। जैसे, स्किनकेयर पर लगातार बढ़ता समय और पैसा खर्च करना, कई चरणों वाली सख्त रूटीन को पूरा करने की मजबूरी महसूस करना, उत्पाद उपलब्ध न होने पर चिंता, शर्म या चिड़चिड़ापन महसूस करना, त्वचा की कमियों को बार-बार देखना, तस्वीर लेना या छिपाना, त्वचा को लेकर चिंता के कारण स्कूल, काम या सामाजिक गतिविधियों से दूर रहना, जलन या नुकसान के बावजूद उत्पादों का इस्तेमाल जारी रखना आदि।
अगर अपनी स्किनकेयर आदतों को लेकर चिंता हो रही है तो ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट को अनफॉलो किया जा सकता है जो तुलना या चिंता बढ़ाते हैं। मैग्नीफाइंग मिरर हटाना, खर्च की सीमा तय करना और बार-बार त्वचा जांचने की आदत कम करना भी मददगार हो सकता है।
फार्मासिस्ट, डॉक्टर या त्वचा विशेषज्ञ रूटीन को आसान बनाने और त्वचा संबंधी समस्याओं का आकलन करने में मदद कर सकते हैं।
माता-पिता के लिए हर उत्पाद पर रोक लगाना या बच्चे की शक्ल-सूरत की आलोचना करना गोपनीयता और तनाव बढ़ा सकता है। इसके बजाय उनसे पूछें कि वे उत्पादों से क्या बदलना चाहते हैं, उन्हें यह सलाह कहां से मिली और रूटीन छूट जाने पर वे कैसा महसूस करते हैं।
बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि फिल्टर और संपादित तस्वीरें त्वचा को लेकर अवास्तविक उम्मीदें पैदा कर सकती हैं। रोमछिद्र, त्वचा की बनावट और मुंहासे सामान्य हैं।
अगर त्वचा को लेकर चिंता बहुत अधिक समय लेने लगे, पढ़ाई, काम या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे या मानसिक स्थिति पर गंभीर असर पड़े तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
स्किनकेयर खुद समस्या नहीं है। चिंता तब शुरू होती है जब त्वचा की देखभाल इस विश्वास में बदल जाए कि स्वीकार्य महसूस करने के लिए त्वचा का पूरी तरह परिपूर्ण होना जरूरी है।
द कन्वरसेशन मनीषा नरेश
नरेश

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