कोलंबो, 14 जनवरी (भाषा) श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के दौरान तमिल नागरिकों के खिलाफ मुख्य रूप से सुरक्षा बलों द्वारा की गई यौन हिंसा का मुद्दा आज भी अनसुलझा है और युद्ध समाप्त होने के 17 साल बाद भी पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।
‘हमने सब कुछ खो दिया – न्याय की उम्मीद भी’ शीर्षक वाली यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय द्वारा एक दशक तक निगरानी और रिपोर्टिंग, पीड़ितों, लिंग आधारित हिंसा पर स्थानीय विशेषज्ञों, नागरिक समाज और अन्य लोगों के साथ व्यापक परामर्श के बाद तैयार की गई है।
‘लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम’ (एलटीटीई) ने द्वीपीय राष्ट्र के उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में एक अलग तमिल मातृभूमि के लिए लगभग 30 वर्षों तक सैन्य अभियान चलाया, लेकिन वर्ष 2009 में श्रीलंका की सेना द्वारा उसके सर्वोच्च नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरन को मार डालने के बाद एलटीटीई का पतन हो गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गृहयुद्ध के दौरान व्यापक रूप से यौन हिंसा की गई, मुख्य रूप से देश के सुरक्षा बलों द्वारा। इसे संघर्ष प्रभावित आबादी को डराने, दंडित करने और उन पर नियंत्रण रखने का जरिया बनाया गया।
इसमें कहा गया है कि इन कृत्यों में मुख्य रूप से तमिल नागरिकों और एलटीटीई के वास्तविक या संदिग्ध सदस्यों को निशाना बनाया गया था, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं।
रिपोर्ट में पाया गया कि मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन और युद्धकालीन अपराधों के लिए जवाबदेही, स्वीकृति और क्षतिपूर्ति के अभाव ने दंड से मुक्ति की एक ऐसी विरासत को जन्म दिया है जो आज भी पीड़ितों के जीवन को प्रभावित कर रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009 में समाप्त हुए इस संघर्ष के कई पीड़ित आज भी गंभीर शारीरिक चोटों, बांझपन, मानसिक विकारों और आत्महत्या जैसे विचारों से जूझ रहे हैं।
रिपोर्ट में श्रीलंका सरकार से देश के सुरक्षा बलों और अन्य लोगों द्वारा अतीत में की गई यौन हिंसा को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने और औपचारिक रूप से माफी मांगने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने का आह्वान किया गया।
भाषा संतोष मनीषा
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