(योषिता सिंह)
न्यूयॉर्क, 11 जुलाई (भाषा) विदेश मंत्री एस. जयशंकर अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 2028-29 के कार्यकाल के लिए अस्थायी सदस्यता को लेकर भारत के अभियान की शुरुआत करेंगे और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस से भी मुलाकात करेंगे।
जयशंकर पांच से 10 जुलाई तक कतर, बहरीन, कुवैत एवं ओमान की आधिकारिक यात्रा पर थे और शनिवार को उनके अमेरिका पहुंचने की संभावना है।
वह सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की सदस्यता को लेकर भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करेंगे।
इसके बाद वह 14 और 15 जुलाई को ब्रसेल्स में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की तीसरी बैठक में भाग लेंगे तथा यूरोपीय संघ और बेल्जियम के अपने समकक्षों से बातचीत करेंगे।
संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी बैठकों के कार्यक्रम के अनुसार, गुतारेस सोमवार दोपहर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जयशंकर से मुलाकात करेंगे।
भारत इससे पहले 2021-22 के कार्यकाल के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य था। वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले वर्ष जून में होंगे। इसमें एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।
सुरक्षा परिषद के चुनाव ऐसे समय में होंगे, जब दुनिया यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष और ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल युद्ध जैसी चुनौतियों से जूझ रही है तथा वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलाव हो रहे हैं।
भारत ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता की उम्मीदवारी के लिए अपने संदेश में ‘‘इंडिया4यूएनएससी 2028-29: शांति, धरती और प्रगति’’ को प्रमुखता दी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सप्ताह इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि वैश्विक व्यवस्था तेजी से बदल रही है और ऐसे में ‘‘हमारे जैसे विकासशील देश वैश्विक मामलों में समान भागीदारी तथा बड़ी भूमिका चाहते हैं।’’
मोदी ने कहा था, ‘‘भारत का दृढ़ विश्वास है कि इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और नहीं टाला जा सकता।’’
भारत वर्षों से सुरक्षा परिषद में सुधार के प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। वह इसके स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग करता रहा है।
भारत का कहना है कि 1945 में गठित 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप नहीं है और यह मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए।
भारत ने सुरक्षा परिषद की स्थायी और अस्थायी, दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने की मांग की है। उसने आगाह किया है कि यदि केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाती है तो सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया ‘‘नाकाम’’ रहेगी क्योंकि इससे पांच स्थायी सदस्यों के हाथों में केंद्रित निर्णय लेने की ताकत के ढांचे में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आएगा।
सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया दशकों से बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है। इस बीच, भारत ने कहा है कि ‘‘जब तक हर बात पर सहमति नहीं बनती, तब तक किसी बात पर सहमति नहीं मानी जाएगी’’ वाला दृष्टिकोण प्रगति रोकने का साधन नहीं बनना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने पिछले महीने कहा था, ‘‘यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर देशों ने इस तर्क का अपने हित में इस्तेमाल करने और इस तरह सुरक्षा परिषद में मौजूदा असमानताओं को और मजबूत करने की कोशिश की है।’’
भाषा सिम्मी रंजन
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