डेस्क। देश दुनिया में चर्चित भारत के कोहिनूर हीरे को लेकर एक खबर आ रही है। पुरातत्व विभाग ने आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में कहा है कि महाराजा दिलीप सिंह ने कोहिनूर को अंग्रेजों के हवाले नहीं किया था, बल्कि खुद इस बहुमूल्य हीरे को इंग्लैड की महारानी को ‘समर्पित‘ किया था।
लुधियाना के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने आरटीआई के तहत जानकारी मांगी थी कि क्या 108 कैरेट के कोहिनूर हीरे को अंग्रेजों को उपहार में दिया गया था या किन्हीं अन्य कारणों से इसे हस्तांतरित किया गया था। सामाजिक कार्यकर्ता रोहित सभरवाल ने कहा कि मैंने करीब एक महीने पहले प्रधानमंत्री कार्यालय में यह आरटीआई लगाई थी।
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एएसआई का कहना है कि राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखे रिकॉर्ड के मुताबिक लॉर्ड डलहौजी और महाराजा दिलीप सिंह के बीच 1849 में लाहौर संधि हुई थी, जिसके तहत लाहौर के महाराजा ने कोहिनूर हीरा को इंग्लैंड की महारानी को समर्पित कर दिया था। कोहिनूर का मतलब प्रकाश का पर्वत होता है और यह बड़ा, रंगहीन हीरा है जो 14वीं सदी की शुरुआत में दक्षिण भारत में पाया गया था।
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जवाब में संधि के बारे में संक्षिप्त में बताया गया है कि ‘‘बेशकीमती पत्थर कोहिनूर को महाराजा रणजीत सिंह ने शाह सुजा उल मुल्क से लिया था जिसे लाहौर के महाराजा ने इंग्लैंड की महारानी को समर्पित कर दिया। जवाब के मुताबिक संधि से प्रतीत होता है कि दिलीप सिंह की इच्छा पर अंग्रेजों को कोहिनूर नहीं सौंपा गया था। संधि के समय दिलीप सिंह नाबालिग थे। हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और केंद्र सरकार के जवाब में विरोधाभास है। दरअसल, केंद्र सरकार ने अप्रैल 2016 में उच्चतम न्यायालय में कहा था कि कोहिनूर की अनुमानित कीमत 20 करोड़ डॉलर से ज्यादा है जिसे न तो चुराया गया था, न ही अंग्रेज शासक उसे जबरदस्ती ले गए थे, बल्कि पंजाब के पूर्ववर्ती शासकों ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया था। अब ASI का कहना है कि लाहौर के महाराजा ने इसे खुद ‘समर्पित‘ किया था।
वेब डेस्क IBC24