(जॉर्ज कैफेट्जिस, ससेक्स विश्वविद्यालय; डैन निल्सन, लुंड विश्वविद्यालय)
ससेक्स, पांच अप्रैल (द कन्वरसेशन) आंखें – जिनसे हम दुनिया देखते हैं, वे हमें इतनी सामान्य लगती है कि हम अक्सर उनकी अहमियत को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हमारे हालिया शोध से पता चलता है कि आज जिस रूप में हम उन्हें देखते हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने विकास की एक बेहद लंबी और रोमांचक यात्रा तय की है।
काफी समय से माना जाता रहा है कि इंसानों और अन्य कशेरुकी जीवों की आंखें, अकशेरुकी जीवों की आंखों से बुनियादी रूप से अलग होती हैं, क्योंकि उनकी कोशिकाओं की संरचना और जन्म से पहले उनके विकसित होने का तरीका अलग होता है।
हालांकि, यह अंतर आखिर क्यों और कैसे पैदा हुआ, इसका जवाब लंबे समय तक रहस्य बना रहा।
हमारे अध्ययन से संकेत मिलता है कि हमारी आंखों की जड़ें एक ऐसे कीड़े जैसे पूर्वज से जुड़ी हैं, जो करीब 60 करोड़ साल पहले समुद्रों में विचरण करता था।
यह ऐसे शुरुआती जीव को दर्शाता है जो आकार और संरचना में कीड़े जैसा था और जिससे आगे चलकर अन्य जटिल जीव विकसित हुए।
यह बात उन सभी जीवों पर लागू होती है, जिनके शरीर को बीच से बांटने पर बाएं और दाएं हिस्से लगभग एक जैसे दिखाई देते हैं—जैसे इंसान, जानवर, पक्षी आदि।
अपने अध्ययन के तहत हमने जीवों के 36 प्रमुख समूहों (जो लगभग सभी द्विपार्श्व जीवों को कवर करते हैं) का विश्लेषण किया, ताकि यह समझा जा सके कि उनकी आंखें और रोशनी को महसूस करने वाली कोशिकाएं कहां होती हैं और क्या काम करती हैं।
इससे एक दिलचस्प बात सामने आई। हमने पाया कि ज्यादातर जीवों में आंखें और रोशनी महसूस करने वाली कोशिकाएं दो जगहों पर होती हैं—एक चेहरे के दोनों तरफ (जोड़ी में) और दूसरी सिर के बीच में, मस्तिष्क के ऊपर।
हमने जिन जीवों का अध्ययन किया, उनमें चेहरे के दोनों तरफ मौजूद ये कोशिकाएं शरीर की गतिविधियों को दिशा देने में मदद करती हैं, जबकि बीच में मौजूद कोशिकाएं दिन और रात के फर्क के साथ-साथ ऊपर-नीचे की पहचान करने में सहायक होती हैं।
हमारे निष्कर्ष के मुताबिक, सभी कशेरुकी जीवों के कीड़े जैसे पूर्वज ने करीब 60 करोड़ साल पहले जब समुद्र की तलहटी में बिल बनाकर स्थिर जीवन जीना शुरू किया, तो उसने “दिशा नियंत्रित करने वाली” अपनी जोड़ी आंखें खो दीं।
दरअसल, जब यह जीव एक जगह रहकर पानी से बीन-बीनकर भोजन हासिल करने लगा, तो उसे चलने-फिरने की जरूरत नहीं रही। इसलिए उसकी ऊर्जा खर्च करने वाली आंखें बेकार हो गईं।
लेकिन इस बदलाव का असर उसके सिर के बीच मौजूद रोशनी महसूस करने वाली कोशिकाओं पर नहीं पड़ा। उन्हें अभी भी दिन-रात का फर्क समझने और ऊपर-नीचे की दिशा पहचानने की जरूरत थी, इसलिए वे सुरक्षित रहीं।
हालांकि, दोनों आंखें गायब हो गईं लेकिन बीच की ये कोशिकाएं धीरे-धीरे विकसित होकर एक छोटी “मध्य आंख” का रूप ले गईं।
संभवतः कुछ ही लाख साल बाद इस जीव की जीवनशैली फिर बदली। जब वह दोबारा तैरने लगा, तो उसे फिर से दिशा नियंत्रित करने और अपने शरीर की गति समझने की जरूरत महसूस हुई, ताकि वह बेहतर तरीके से भोजन हासिल कर सके और शिकारियों से बच सके।
जब विकास की प्रक्रिया ने मध्य रेखा पर एक आंख का निर्माण किया, तब उसके दोनों ओर आंखों के आकार (आई कप) बनने लगे। समय के साथ ये आकार उस मध्य आंख से अलग हो गए, सिर के किनारों की ओर खिसक गए और अंततः दो नयी आंखों के रूप में विकसित हो गए—यही हमारी मौजूदा आंखें हैं।
दृष्टि का जाना और फिर से प्राप्त होना लगभग 60 करोड़ से 54 करोड़ वर्ष पूर्व के बीच हुआ। मध्य रेखीय आंख के कुछ घटक बने रहे और आगे चलकर मस्तिष्क में पीनियल अंग के रूप में परिवर्तित हो गए, जो नींद से संबंधित हार्मोन मेलाटोनिन का निर्माण एवं स्राव करता है।
अनेक कशेरुकी जीवों में यह पीनियल अंग सिर के मध्य स्थित एक पारदर्शी (अवर्णित) क्षेत्र के माध्यम से प्रकाश को ग्रहण करता है।
परंतु स्तनधारियों के वंश में पीनियल अंग ने प्रकाश-संवेदन की अपनी क्षमता खो दी—संभवतः इसलिए कि प्रारंभिक स्तनधारी रात्रिचर थे और दिन के समय छिपे रहते थे। परिणामस्वरूप, अधिक संवेदनशील आंखों ने प्रकाश का बोध करने का काम संभाल लिया, जो मेलाटोनिन के स्राव और नींद के नियमन को नियंत्रित करता है।
द कन्वरसेशन खारी गोला
गोला