ऑक्सफोर्ड विवि पुस्तकालय हिंदू ग्रंथ ‘शिक्षापत्री’ का द्विशताब्दी समारोह मना रहा

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ऑक्सफोर्ड विवि पुस्तकालय हिंदू ग्रंथ ‘शिक्षापत्री’ का द्विशताब्दी समारोह मना रहा

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  • Publish Date - April 5, 2026 / 03:52 PM IST,
    Updated On - April 5, 2026 / 03:52 PM IST

(तस्वीर के साथ)

(अदिति खन्ना)

लंदन, पांच अप्रैल (भाषा) ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बोडलियन पुस्तकालय ने विश्व के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्लभ हिंदू धर्मग्रंथों में से एक ‘शिक्षापत्री’ की 200वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में पूरे ब्रिटेन में एक ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत की है।

पांडुलिपि की यात्रा इसकी रचना के 200 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इस वर्ष के प्रारंभ में शुरू हुई। इस पांडुलिपि को स्वामीनारायण पंथ के नेताओं के सहयोग से देश भर के प्रमुख मंदिरों में ले जाया जाएगा ताकि अनुमानित तौर पर 20,000-30,000 लोग इस पवित्र ग्रंथ का दर्शन कर सकें।

गुजरात के वडताल में सहजानंद स्वामी-भगवान स्वामीनारायण द्वारा 1826 में रचित ‘शिक्षापत्री’ नैतिक और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम करती है।

बोडलियन में एशियाई और मध्य पूर्वी संग्रह की क्यूरेटर डॉ. गिलियन एविसन ने कहा, ‘‘ब्रिटेन भर के मंदिरों और समुदायों के साथ इस ऐतिहासिक पांडुलिपि को साझा करके, बोडलियन पुस्तकालयों को उम्मीद है कि वे इसके सांस्कृतिक महत्व और इसके स्थायी संदेश दोनों का सम्मान करेंगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘रचना के दो शताब्दी बाद भी, ‘शिक्षापत्री’ में करुणा, नैतिक जीवन और सामाजिक सद्भाव का आह्वान जटिल होती दुनिया में प्रासंगिक है।’’

ऐसा कहा जाता है कि यह पांडुलिपि बसंत पंचमी के दिन लिखी गई थी, जिसमें 212 संस्कृत श्लोक हैं जो हिंदू धर्मग्रंथों के प्रमुख सिद्धांतों का सार प्रस्तुत करते हैं।

स्वामीनारायण के अनुयायियों द्वारा प्रतिदिन पढ़े जाने वाले इस ग्रंथ की विश्व स्तर पर लाखों प्रतियां छप चुकी हैं। बोडलियन संग्रहालय का दावा है कि उसकी पांडुलिपि ऐतिहासिक महत्व रखती है क्योंकि यह लेखक द्वारा स्वयं प्रदान किए गए ग्रंथ की सबसे पुरानी ज्ञात प्रतियों में से एक है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने कहा, ‘‘इस पांडुलिपि में एक गहरा ऐतिहासिक महत्व निहित है। 26 फरवरी, 1830 को सहजानंद स्वामी ने स्वयं यह प्रति बंबई के तत्कालीन गवर्नर सर जॉन मैल्कम को भेंट की थी। औपनिवेशिक उथल-पुथल के दौर में, इस ग्रंथ ने नैतिक आचरण और जीवनशैली के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया।’’

इसने कहा, ‘‘आज भी ‘शिक्षापत्री’ लाखों भक्तों के दैनिक जीवन को आकार दे रही है, जिसमें अहिंसा, शाकाहार, ईमानदारी और पापपूर्ण व्यवहार से बचने जैसे सिद्धांतों को बढ़ावा दिया जाता है।’’

पांडुलिपि की यात्रा अगस्त तक चलेगी और इस दौरान इसे लंदन तथा वेल्स के विभिन्न हिस्सों में स्थित स्वामीनारायण मंदिरों में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाएगा।

भाषा धीरज नेत्रपाल

नेत्रपाल