एपस्टीन फाइल: कौन तय करता है कि कौन सी जानकारी जनता के लिए जारी की जाएगी?

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एपस्टीन फाइल: कौन तय करता है कि कौन सी जानकारी जनता के लिए जारी की जाएगी?

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  • Publish Date - February 7, 2026 / 05:39 PM IST,
    Updated On - February 7, 2026 / 05:39 PM IST

(मैथ्यू मोखेफी-एश्टन, नॉटिंघम ट्रेंट विश्वविद्यालय द्वारा)

नॉटिंघम (ब्रिटेन), सात फरवरी (द कन्वरसेशन) किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के सबसे कठिन कार्यों में से एक है जानने के अधिकार और जानने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना। सिर्फ इसलिए कि जनता कुछ जानना चाहती है, इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें जानना ही चाहिए। लेकिन सूचना तक इस पहुंच के बिना, मतदाता कैसे सोच-समझकर निर्णय ले सकते हैं और शक्तिशाली लोगों को जवाबदेह कैसे ठहराया जा सकता है?

यह बहस अब एपस्टीन फाइल के प्रकाशन और संपादन के केंद्र में है।

पिछले लगभग एक दशक से, एपस्टीन फाइल का इस्तेमाल डेमोक्रेट और रिपब्लिकन द्वारा एक दूसरे पर निशाना साधने के लिए राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाता रहा है। इस बीच, ऑनलाइन अटकलों का दौर है और दुनियाभर में इस बात को लेकर अटकलें हैं कि इन फाइल में क्या है और इनमें किसका नाम है या किसका नहीं।

इस समय ट्रंप प्रशासन के सामने यही दुविधा है। एक ओर, इस बात को लेकर जनता का जायज गुस्सा है कि उन्हें सच नहीं बताया गया है और दुनिया के कुछ सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली लोगों ने बिना किसी दंड के भयानक अपराध किए होंगे। यह आक्रोश और इसके राजनीतिक निहितार्थ ही मुख्य कारण है कि अमेरिकी कांग्रेस ने नवंबर 2025 में एपस्टीन फाइल को जारी करने के लिए मतदान किया।

इस चर्चा में अक्सर जिस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, वह यह है कि ये फाइल दस्तावेजों का एक सेट नहीं हैं। इसके बजाय, ये सूचनाओं के कई पैकेज हैं, जिनमें संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) की जांच द्वारा एकत्रित फाइल, अदालती रिकॉर्ड और ग्रैंड जूरी के दस्तावेज शामिल हैं। कानूनी दृष्टि से यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

अब तक उपलब्ध कराये गये दस्तावेजों में से कई को बड़े पैमाने पर संपादित किया गया है जिनमें नाम, पते, ई-मेल और तस्वीरों को काली पट्टियों से ढक दिया गया है। कुछ मामलों में, यह स्पष्ट है कि ऐसा क्यों हुआ है। अन्य मामलों में, संपादन के पीछे कोई कारण न होने से विवाद और बढ़ गया है, और लोग स्वयं ही अधूरी जानकारी को पूरा करने में जुट गये हैं।

अमेरिका को लंबे समय से पृथ्वी पर सबसे स्वतंत्र समाजों में से एक होने पर गर्व रहा है। वाटरगेट कांड ने सरकार की ईमानदारी पर जनता के भरोसे को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाई थी, जिसके बाद सरकारी फाइल को जनता के लिए उपलब्ध कराने के लिये कई महत्वपूर्ण कानून पारित किये गये। इनमें 1966 का सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (एफओआईए), 1996 का इलेक्ट्रॉनिक एफओआईए संशोधन और 2016 का एफओआईए सुधार अधिनियम शामिल हैं।

इन अधिनियमों में संघीय सरकार भी शामिल है, जिसमें एफबीआई और न्याय विभाग भी शामिल हैं, जो एपस्टीन मामले की निगरानी कर रहे हैं। लेकिन ऐसे कानून भी बनाये गये हैं जिनके जरिये यह सीमित कर दिया है कि क्या जारी किया जा सकता है। इसमें 1974 का गोपनीयता अधिनियम भी शामिल है। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आम जनता के किसी भी सदस्य के नाम सार्वजनिक न हों और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे।

इसमें शामिल होने वाली सरकारी एजेंसियों की संख्या को देखते हुए, यह प्रक्रिया हमेशा एक समान नहीं रही है। एक एजेंसी दस्तावेज के एक हिस्से को संपादित कर सकती है, जबकि दूसरी एजेंसी किसी दूसरे हिस्से को संपादित कर सकती है। कुछ मामलों में, दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने के बावजूद भी इनमें से कुछ अंश संपादित किए जा सकते हैं।

क्योंकि यह प्रक्रिया कानूनी और राजनीतिक रूप से इतनी जटिल है, इसलिए यह काम आमतौर पर संघीय नौकरशाही में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि कुछ फाइल और जानकारी सूचना की स्वतंत्रता कानूनों के दायरे में नहीं आती हैं। संभवतः सबसे महत्वपूर्ण दो रिकॉर्ड अदालत और ग्रैंड जूरी के रिकॉर्ड हैं।

सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम में कई महत्वपूर्ण कारण बताये गये हैं कि फाइल को क्यों संपादित किया जा सकता है। समस्या यह है कि बिना स्पष्टीकरण के यह जानना मुश्किल है कि कौन से लागू होते हैं। सबसे पहला और सबसे स्पष्ट कारण राष्ट्रीय सुरक्षा है। यदि किसी एजेंसी को लगता है कि किसी विशेष जानकारी के जारी होने से अमेरिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है, तो उसके पास जानकारी को रोकने के व्यापक अधिकार हैं।

यह तब भी लागू होता है, जब जानकारी में गुप्त एजेंट के नाम, सैनिकों की गतिविधियों का विवरण या प्रभावित होने वाले कार्यक्रमों जैसी विशिष्ट बातों का उल्लेख न हो, लेकिन इसमें एजेंसियों के कामकाज के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी शामिल हो।

एपस्टीन फाइल के मामले में, इसका मतलब यह है कि बहुत सारी जानकारी को छिपा दिया गया है (हालांकि ऐसी खबरें हैं कि कुछ पीड़ितों के नाम सामने आए हैं और कुछ मामलों में, उनके पते और यहां तक ​​कि तस्वीरें भी प्रकाशित की गई हैं)।

क्योंकि एपस्टीन एक बहुत ही प्रमुख व्यक्ति थे और सत्ता में बैठे लगभग सभी लोगों को जानते थे, इसलिए संभव है कि इन सभी कारणों से जानकारी को संपादित किया जा रहा हो।

इन सभी बातों के बीच संतुलन बनाये रखना आवश्यक है, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि फाइल में उजागर हुए किसी भी गलत काम में शामिल सही लोगों को, चाहे वे कितने भी शक्तिशाली या प्रभावशाली क्यों न हों, जवाबदेह ठहराया जाये।

फिलहाल तो ऐसा लगता है कि इस बात पर बहस अनिश्चितकाल तक चलती रहेगी कि क्या सार्वजनिक किया जाना चाहिए और क्या गुप्त रखा जाना चाहिए।

(द कन्वरसेशन)

देवेंद्र दिलीप

दिलीप