आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं, सत्ता की इच्छा नहीं रखता: भागवत

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आरएसएस किसी के खिलाफ नहीं, सत्ता की इच्छा नहीं रखता: भागवत

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  • Publish Date - February 7, 2026 / 07:09 PM IST,
    Updated On - February 7, 2026 / 07:09 PM IST

मुंबई, सात फरवरी (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भगवत ने शनिवार को कहा कि संघ किसी के ‘‘खिलाफ’’ नहीं है और ना ही वह सत्ता या लोकप्रियता चाहता है।

भागवत ने यहां जनसभा को संबोधित करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उभरी विभिन्न विचारधाराओं का उल्लेख किया, जिनका प्रतिनिधित्व राजा राम मोहन रॉय, स्वामी विवेकानंद और दयानंद सरस्वती सहित सुधारकों और नेताओं ने किया।

उन्होंने कहा, “हालांकि फिर भी यह देखा जा रहा है कि समाज को दिशा देने और अनुकूल वातावरण बनाने का काम नहीं हो रहा है।”

भागवत ने कहा कि आरएसएस ‘‘किसी के खिलाफ नहीं है’’ और किसी घटना की प्रतिक्रिया के रूप में काम नहीं करता है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य देश में जारी सकारात्मक प्रयासों का समर्थन और उन्हें मजबूत करना है।

भगवत ने कहा कि संघ कोई अर्धसैनिक बल नहीं है, भले ही वह नियमित ‘पथ संचलन’ करता है और उसके स्वयंसेवक लाठी चलाते हैं, लेकिन इसे एक अखाड़े के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आरएसएस राजनीति में भी शामिल नहीं है, हालांकि संघ से जुड़े कुछ लोग राजनीतिक जीवन में सक्रिय हैं।

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने वर्ष 1925 में आरएसएस की स्थापना से पहले के देश की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को एक “सुरक्षा वाल्व” के रूप में स्थापित किया, लेकिन भारतीयों ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का शक्तिशाली साधन बना दिया।

भागवत ने आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए उनके बचपन की कठिन परिस्थितियों का वर्णन किया, जिसमें 13 वर्ष की उम्र में प्लेग से माता-पिता का निधन और उसके बाद हुई आर्थिक कठिनाइयां शामिल थीं।

भागवत ने कहा कि हेडगेवार ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसमें उनके स्कूल के दिनों में वंदे मातरम् आंदोलन भी शामिल था। भागवत ने कहा कि जब उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की, तो नागपुर के कुछ लोगों ने उन्हें मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोलकाता भेजने हेतु धन जुटाया, जहां वह क्रांतिकारी समूहों के सम्पर्क में आये।

भागवत ने उस दौर की एक घटना को याद करते हुए कहा कि हेडगेवार ने ‘कोकेन’ नाम के कोडनेम से काम किया, जो कोकेनचंद्र नामक व्यक्ति से प्रेरित था। उन्होंने कहा कि एक बार पुलिस की टीम, जो कोकेनचंद्र को गिरफ्तार करने आई थी, गलतफहमी में हेडगेवार को ही हिरासत में ले गई और यह घटना रास बिहारी बोस की किताब में दर्ज है।

भाषा अमित दिलीप

दिलीप