( जॉर्डन मिलेर – एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी )
फीनिक्स, दो फरवरी (द कन्वरसेशन) विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से बाहर होने के अमेरिका के फैसले ने वैश्विक स्वास्थ्य नीति में एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। हालांकि इस फैसले से दुनिया के देशों के साथ साथ अमेरिका को भी नुकसान होगा।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अन्य देशों की तुलना में डब्ल्यूएचओ के लिए अमेरिका का वित्तीय योगदान अधिक है, जो उसके लिए ठीक नहीं है। व्हाइट हाउस के अनुसार, चीन की आबादी अमेरिका से लगभग तीन गुना अधिक होने के बावजूद उसका योगदान अमेरिका से करीब 90 प्रतिशत कम है।
ट्रंप प्रशासन ने यह भी आरोप लगाया है कि कोविड-19 महामारी से निपटने में डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया कमजोर रही और संगठन में जवाबदेही व पारदर्शिता का अभाव है। वहीं, डब्ल्यूएचओ ने इन आरोपों को खारिज करते हुए मास्क और दूरी जैसी सिफारिशों सहित महामारी में सुझाए गए कदमों का जिक्र किया है।
आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका डब्ल्यूएचओ का सबसे बड़ा वित्तीय सहयोगी रहा है। वर्ष 2023 में अमेरिकी योगदान यूरोपीय आयोग से लगभग तीन गुना और दूसरे सबसे बड़े दानदाता जर्मनी से करीब 50 प्रतिशत अधिक था।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों की रोकथाम और समय पर प्रतिक्रिया, उनके व्यापक रूप लेने के बाद निपटने की तुलना में कहीं कम खर्चीली होती है।
डब्ल्यूएचओ से अमेरिका की वापसी की प्रक्रिया जटिल है। संगठन में शामिल होते समय अमेरिका ने अपने समझौते में एक विशेष प्रावधान जोड़ा था, जिसके तहत वह एक साल का नोटिस देकर और सभी बकाया भुगतान कर संगठन से बाहर हो सकता है। ट्रंप के कार्यभार संभालते ही अमेरिका ने नोटिस दे दिया था, और उस पर 2024-25 के लिए लगभग 26 करोड़ अमेरिकी डॉलर का बकाया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के अलग होने से देश और विदेश, दोनों जगह सार्वजनिक स्वास्थ्य कमजोर होगा। डब्ल्यूएचओ संक्रामक रोगों की रोकथाम, एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने, दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाता है। अमेरिका के हटने से संगठन की कई योजनाएं प्रभावित होंगी।
वित्तीय कमी के चलते डब्ल्यूएचओ ने 2026 की गर्मियों तक करीब 2,300 कर्मचारियों-यानी कुल कार्यबल के एक चौथाई-की छंटनी करने और 10 डिवीजनों को घटाकर चार करने की योजना की घोषणा की है। अमेरिका और डब्ल्यूएचओ के सहयोग से इबोला, एमपॉक्स और मारबर्ग वायरस जैसे घातक प्रकोपों पर काबू पाने में सफलता मिली थी।
जनवरी 2026 में ‘इन्फेक्शियस डिजीज़ सोसाइटी ऑफ अमेरिका’ ने इस फैसले को “अदूरदर्शी और गलत” करार देते हुए कहा कि वैश्विक सहयोग के बिना नागरिकों की सुरक्षा संभव नहीं है।
डब्ल्यूएचओ से बाहर होने के बाद अमेरिका संगठन की वैश्विक इन्फ्लूएंजा निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली का हिस्सा नहीं रहेगा, जो 1952 से संचालित है। इससे फ्लू वैक्सीन की योजना और निर्माण की अमेरिकी क्षमता प्रभावित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों और मौतों की संख्या बढ़ सकती है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका की छवि और प्रभाव को भी नुकसान पहुंचेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि चीन इस अवसर का उपयोग कर डब्ल्यूएचओ में अपनी भूमिका और वैश्विक प्रभाव बढ़ाएगा। चीन ने अगले पांच वर्षों में संगठन को अतिरिक्त 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर देने का वादा किया है।
डब्ल्यूएचओ ने अमेरिका के फैसले पर खेद जताते हुए भविष्य में पुनर्विचार की उम्मीद जताई है। इस बीच, अमेरिकी राज्यों ने वैकल्पिक पहल शुरू की हैं। कैलिफोर्निया ने हाल ही में डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल आउटब्रेक अलर्ट एंड रिस्पॉन्स नेटवर्क से जुड़ने की घोषणा की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन के सार्वजनिक स्वास्थ्य से पीछे हटने के चलते जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भरने के लिए ऐसे प्रयास आगे भी देखने को मिलेंगे।
( द कन्वरसेशन ) मनीषा शोभना
शोभना