अब्राहम समझौतों का दायरा बढ़ाने की ट्रंप की कोशिश मुश्किलों में घिरी

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अब्राहम समझौतों का दायरा बढ़ाने की ट्रंप की कोशिश मुश्किलों में घिरी

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  • Publish Date - June 1, 2026 / 12:27 PM IST,
    Updated On - June 1, 2026 / 12:27 PM IST

(साइमन मैबोन, अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर, लैंकेस्टर विश्वविद्यालय)

लंदन, एक जून (द कन्वरसेशन) ईरान युद्ध को समाप्त करने के लिए 25 मई को बातचीत जारी रहने के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पश्चिम एशिया के कई प्रमुख नेताओं से फोन पर बात की और उन पर अब्राहम समझौतों में शामिल होने का दबाव डाला।

वर्ष 2020 में घोषित इन समझौतों के तहत इजराइल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे। इसकी शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन से हुई।

उसी दिन बाद में ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में इस प्रस्ताव को दोहराते हुए लिखा, “इस बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए अमेरिका ने जो कुछ भी किया है, उसे देखते हुए कम से कम इतना तो अनिवार्य होना चाहिए कि ये सभी देश एक साथ अब्राहम समझौतों पर हस्ताक्षर करें।”

ट्रंप की पोस्ट से यह भी संकेत मिला कि ईरान को भी इन समझौतों में शामिल किया जा सकता है। यह अपने आप में चौंकाने वाला विचार है, क्योंकि इन समझौतों पर हस्ताक्षर करने के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य क्षेत्र में ईरानी प्रभाव का मुकाबला करना भी था। लेकिन दुर्भाग्यवश ट्रंप के लिए यह विचार फिलहाल हकीकत से ज्यादा एक कल्पना जैसा प्रतीत होता है।

पश्चिम एशिया के बहुत कम नेता ट्रंप के इस प्रस्ताव से सहमत हो सकते हैं। 26 मई को प्रकाशित ‘पोलिटिको’ की एक खबर में अमेरिका के एक पूर्व राजनयिक ने ट्रंप के बयानों को “जहर’’” बताया।

उन्होंने कहा कि ट्रंप ने शांति के लिए ऐसी नयी शर्तें जोड़ दी हैं जिन्हें न तो ईरान स्वीकार करेगा और न ही वे देश जिनसे यह अपेक्षा की जा रही है।

इस प्रस्ताव के जरिए ट्रंप गाजा और लेबनान में इजराइल की सैन्य कार्रवाई को लेकर पश्चिम एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों में व्याप्त गहरे आक्रोश और नाराजगी का सही आकलन करने में नाकाम दिखते हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार गाजा में मृतकों की संख्या 70,000 से अधिक हो चुकी है जहां इजराइल 2023 से सैन्य अभियान चला रहा है। कई लोग इन घटनाओं को “नरसंहार” की संज्ञा दे रहे हैं।

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दक्षिणी लेबनान में भी इजराइल ने जमीनी स्तर पर सैनिकों और लगातार हवाई हमलों का सहारा लिया है। माना जा रहा है कि उसका उद्देश्य हिजबुल्ला के हमलों से बचाव के लिए एक “बफर जोन” बनाना है।

अब तक वहां 3,200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, सात हजार से अधिक लोग घायल हुए हैं और लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। यह स्थिति तब है जब अप्रैल में इजराइल और लेबनान सरकार के बीच युद्धविराम समझौता भी हो चुका था।

ट्रंप के प्रस्ताव का विरोध

गाजा में हुई तबाही के कारण बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात भी खफा हैं। युद्ध शुरू होने के कुछ ही समय बाद बहरीन ने इजराइल से अपने राजदूत को वापस बुला लिया था। हालांकि, दोनों देशों ने अब्राहम समझौतों से खुद को अलग नहीं किया।

इसके बजाय व्यापारिक और सुरक्षा सहयोग जारी रहा। दोनों देशों का मानना था कि इजराइल के साथ करीबी संबंध उनके राष्ट्रीय हित में हैं।

फिर भी, बहरीन और यूएई पश्चिम एशिया में अपवाद माने जाते हैं। क्षेत्र के अन्य देश इजराइल के साथ संबंध सामान्य बनाने के लिए न तो उतने इच्छुक हैं और न ही राजनीतिक रूप से उतनी आसानी से ऐसा कर सकते हैं।

बताया जाता है कि 2024 में सऊदी अरब के दौरे पर गए अमेरिकी अधिकारियों से युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था कि यदि वह इजराइल के साथ संबंध सामान्य करते हैं, तो उनकी जान को खतरा हो सकता है। यह टिप्पणी अब्राहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने के चार साल बाद भी क्षेत्र में इस मुद्दे की संवेदनशीलता को रेखांकित करती है।

हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि गाजा युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब और इजराइल संबंध सामान्य करने के करीब पहुंच चुके थे, लेकिन सऊदी अधिकारियों ने इस दावे को काफी हद तक खारिज किया है।

गाजा युद्ध शुरू होने के बाद से मोहम्मद बिन सलमान और अन्य सऊदी अधिकारी लगातार यह दोहराते रहे हैं कि फलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना की दिशा में ठोस और अपरिवर्तनीय कदम उठाए बिना इजराइल के साथ राजनयिक संबंध सामान्य नहीं किए जाएंगे।

उधर, इजराइल और तुर्किये के बीच भी तनाव लंबे समय से बढ़ रहा है। फरवरी में इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने तुर्किये की तुलना “ईरान” से की थी।

इसके बाद 20 मई को इजराइल के संस्कृति एवं खेल मंत्री मिकी जोहार ने कहा कि तुर्किये को “दुश्मन देश” के रूप में देखा जाना चाहिए।

कतर में भी सरकारी अधिकारी इजराइल से बेहद खफा हैं। वर्ष 2025 में इजराइल ने दोहा में हमले किए थे, जिनका उद्देश्य वहां मौजूद चरमपंथी समूह हमास के प्रमुख नेताओं को निशाना बनाना बताया गया था।

कतर का कहना था कि उसने अमेरिका और इजराइल के अनुरोध पर जारी व्यापक मध्यस्थता प्रयासों के तहत हमास नेताओं को शरण दे रखी थी।

इन हमलों के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास ‘व्हाइट हाउस’ की एक तस्वीर काफी चर्चित हुई थी, जिसमें ट्रंप की मौजूदगी में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी को फोन पर हमलों के लिए खेद जता रहे थे।

क्या ईरान अब्राहम समझौतों में शामिल हो सकता है?

हाल में हुए विनाशकारी युद्ध के तुरंत बाद ईरान के अब्राहम समझौतों में शामिल होने की संभावना भी बेहद अवास्तविक लगती है।

इजराइल और ईरान के बीच तनाव की जड़ें 1979 तक जाती हैं, जब ईरानी क्रांति ने राजशाही को उखाड़ फेंका था और इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई थी।

नयी ईरानी सरकार ने शुरुआत से ही फलस्तीनी मुद्दे का समर्थन किया और बाद के वर्षों में हिजबुल्ला तथा पश्चिम एशिया के अन्य सशस्त्र समूहों को भी सहयोग दिया।

इसके जवाब में इजराइल ने ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए, प्रमुख परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या की और अनेक अन्य गुप्त एवं सैन्य अभियान चलाए।

ऐसे में लगभग आधी सदी पुराने इस टकराव को बिना किसी गंभीर मेल-मिलाप प्रक्रिया के नजरअंदाज कर देने का सुझाव वास्तविकता से परे प्रतीत होता है।

ट्रंप ने ऐसा प्रस्ताव क्यों रखा?

फिर सवाल उठता है कि ट्रंप ने ऐसा प्रस्ताव रखा ही क्यों?

एक संभावना यह है कि वह अमेरिका के भीतर या इजराइल में मौजूद उन समूहों को संतुष्ट करना चाहते हों जो तेल अवीव और अरब व मुस्लिम देशों के बीच स्थिति को सामान्य करने की वकालत करते हैं।

दूसरी व्याख्या यह हो सकती है कि यह ईरान के साथ तनाव कम करने की दिशा में संभावित कूटनीतिक प्रगति को रोकने का प्रयास है। इजराइल के साथ संबंध सामान्य बनाने जैसी लगभग असंभव शर्त जोड़कर वार्ता के रास्ते में बड़ी बाधा खड़ी की जा सकती है। यह अमेरिका में युद्ध को लेकर मौजूद विभिन्न दृष्टिकोणों को भी दर्शाता है।

तीसरा दृष्टिकोण यह है कि यह गाजा, वेस्ट बैंक और लेबनान में हुई भारी तबाही तथा मानवीय पीड़ा के महत्व को कम करके दिखाने की कोशिश हो सकती है। इसके पीछे यह धारणा हो सकती है कि व्यापार और सुरक्षा हितों पर आधारित अदान-प्रदान की राजनीति अंततः पर्याप्त साबित होगी।

लेकिन जैसा कि ट्रंप को भी समझ में आएगा, इस रणनीति के सफल होने की संभावना फिलहाल बहुत कम दिखाई देती है।

द कन्वरसेशन

खारी रंजन

रंजन