( जेमिमा कांग, माइक कॉनवे एवं निक हैजलाम – मेलबर्न यूनिवर्सिटी )
मेलबर्न, एक जून (द कन्वरसेशन) सोशल मीडिया मंचों पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी लेने और समान अनुभव वाले लोगों से जुड़ने के लिए बढ़ती निर्भरता के बीच एक नए अध्ययन में पाया गया है कि ऑनलाइन चर्चाओं का केंद्र अब अवसाद और चिंता जैसे पारंपरिक मानसिक विकारों से हटकर एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) और ऑटिज्म जैसी तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याएं बन रही हैं।
शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया मंच ‘रेडिट’ पर मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित 1.4 करोड़ से अधिक पोस्ट और टिप्पणियों का विश्लेषण कर यह निष्कर्ष निकाला। अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोगों की समझ, बीमारी की पहचान और उपचार के लिए सहायता प्राप्त करने के तरीकों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर रहा है।
अध्ययन में कहा गया है कि हाल के वर्षों में लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए टिकटॉक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और रेडिट जैसे मंचों का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। यह रुझान केवल अवसाद, चिंता और शिजोफ्रेनिया जैसे मानसिक विकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑटिज्म, एडीएचडी, टॉरेट सिंड्रोम और डिस्लेक्सिया जैसी उन स्थितियों तक भी फैला हुआ है जिन्हें आमतौर पर ‘‘न्यूरोडाइवर्जेंट’’ श्रेणी में रखा जाता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि टिकटॉक पर ‘एडीएचडी’ हैशटैग को 50 अरब से अधिक बार देखा जा चुका है, जो इस विषय में बढ़ती सार्वजनिक रुचि को दर्शाता है।
अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सामग्री के बढ़ते प्रसार से यह बदलाव आया है। इससे मानसिक बीमारियों से जुड़े सामाजिक कलंक में कमी आने और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना है। हालांकि, इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं में गलत और भ्रामक जानकारी भी व्यापक रूप से मौजूद है। एक अध्ययन में पाया गया था कि टिकटॉक पर एडीएचडी से जुड़े सबसे लोकप्रिय वीडियो में से अधिकतर में भ्रामक या गलत जानकारी थी। अन्य मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में भी ऐसी गलत सूचनाएं आम हैं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सामग्री केवल मात्रा के स्तर पर नहीं बढ़ी है, बल्कि विभिन्न मानसिक स्थितियों को मिलने वाला ध्यान भी समय के साथ बदला है।
शोधकर्ताओं के पिछले अध्ययन में पाया गया था कि वर्ष 2012 से 2022 के बीच एडीएचडी और ऑटिज्म से संबंधित सबसे बड़े रेडिट समुदायों की लोकप्रियता लगातार बढ़ी।
अध्ययन में कहा गया कि दोनों समुदायों में वयस्कों के अनुभव, निदान संबंधी परीक्षणों तक पहुंच में आने वाली कठिनाइयों और व्यक्तिगत संबंधों से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा लगातार बढ़ी।
नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 से 2022 के बीच रेडिट के 14 प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य समुदायों का विश्लेषण किया। इनमें मनोदशा संबंधी विकारों, चिंता, आघात, व्यक्तित्व विकारों और मनोविकृति से जुड़े समुदायों के अलावा ऑटिज्म, एडीएचडी, टॉरेट सिंड्रोम और डिस्लेक्सिया जैसी न्यूरोडाइवर्जेंट स्थितियों पर केंद्रित समुदाय भी शामिल थे।
विश्लेषण में सामने आया कि 2015 में अवसाद और चिंता से जुड़े समुदाय रेडिट पर सबसे प्रमुख थे। लेकिन 2022 तक स्थिति बदल गयी। एडीएचडी और ऑटिज्म से जुड़े समुदाय सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली बन गए थे तथा उन्होंने अवसाद और चिंता की जगह ले ली थी। एडीएचडी, ऑटिज्म और अन्य न्यूरोडाइवर्जेंट स्थितियों से जुड़े समुदायों का संबंध भी अन्य मानसिक स्वास्थ्य समुदायों के साथ अधिक मजबूत हो गया था, जिससे वे पूरे नेटवर्क के केंद्र में आ गए।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि रेडिट पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विमर्श का स्वरूप बदल चुका है। पहले जहां चर्चाओं में मनोदशा और चिंता संबंधी विकारों का प्रभुत्व था, वहीं अब बातचीत का केंद्र तेजी से न्यूरोडाइवर्जेंट स्थितियां बनती जा रही हैं।
अध्ययन में यह भी स्वीकार किया गया कि रेडिट उपयोगकर्ता सामान्य आबादी का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करते। आम तौर पर रेडिट उपयोगकर्ता अपेक्षाकृत युवा, पुरुष, अधिक शिक्षित और अधिक आय वाले होते हैं। इसके बावजूद अध्ययन सोशल मीडिया मंचों पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं में समय के साथ आए बदलावों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि एडीएचडी और ऑटिज्म की प्रमुखता कुछ लोगों को अपनी समस्याओं की सही पहचान करने में मदद कर सकती है, विशेष रूप से उन लोगों को जो पहले अपनी कठिनाइयों की प्रकृति को समझ नहीं पाते थे। हालांकि, इससे यह जोखिम भी पैदा हो सकता है कि कुछ लोग अपने अनुभवों और लक्षणों को गलत तरीके से एडीएचडी या ऑटिज्म से जोड़कर देखें, जबकि उनके पीछे कोई अन्य कारण हो सकता है।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर इन स्थितियों की बढ़ती चर्चा के कारण लोग चिंता या मनोदशा संबंधी लक्षणों को भी एडीएचडी अथवा ऑटिज्म के संकेत के रूप में समझ सकते हैं। ऐसी गलत व्याख्याएं लोगों को अनुपयुक्त निदान या अप्रभावी उपचार की ओर ले जा सकती हैं, जिससे उन्हें आवश्यक सहायता लेने में देरी हो सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका परिणाम मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते दबाव के रूप में भी सामने आ सकता है। साथ ही, इससे अन्य मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों के नजरअंदाज होने का खतरा भी बढ़ सकता है, जिनके लिए समय पर पहचान और उपचार आवश्यक है।
द कन्वरसेशन मनीषा रंजन
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