(एलिजाबेथ मेन्डेनहाल, रोड आईलैंड यूनिवर्सिटी में समुद्री विभाग में सहायक प्राध्यापक)
रोड आइलैंड, 15 अप्रैल (द कन्वरसेशन) होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच कानूनी मतभेद गहराते जा रहे हैं, जिससे इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की स्थिति जटिल बनी हुई है और वैश्विक व्यापार पर भी इसका असर पड़ सकता है।
भौगोलिक रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य एक संकीर्ण समुद्री मार्ग है, जो दो बड़े समुद्री क्षेत्रों को जोड़ता है और जिसके जरिए विश्व के करीब 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। हालांकि, इसकी राजनीतिक और कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्ट सहमति नहीं है।
अमेरिका इस जलडमरूमध्य को पूर्ण रूप से अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानता है, जबकि ईरान इसे अपने जल क्षेत्र का हिस्सा बताता है। इस कारण दोनों देशों के बीच नियमों की व्याख्या को लेकर गंभीर मतभेद हैं।
इसी संदर्भ में, ईरान द्वारा जहाजों से ‘टोल’ (शुल्क) वसूली को अमेरिका अवैध करार दे रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जलडमरूमध्य में नाकेबंदी की कार्रवाई को ईरान अपनी संप्रभुता का “गंभीर उल्लंघन” बता रहा है।
समुद्री कानून के विशेषज्ञों के अनुसार, विवाद की जड़ अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों की अलग-अलग व्याख्या में निहित है। ‘लॉ ऑफ द सी’ यानी समुद्री कानून अंतरराष्ट्रीय नियमों, परंपराओं और समझौतों का ऐसा ढांचा है, जो महासागरों में पहुंच, नियंत्रण और अधिकारों को निर्धारित करता है।
इस ढांचे का प्रमुख आधार 1982 में तैयार और 1994 से लागू संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (यूएनसीएलओएस) है, जिसका उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों के उपयोग को लेकर एक स्थिर और सर्वमान्य व्यवस्था बनाना है। इस संधि को 171 देशों और यूरोपीय संघ ने अनुमोदित किया है, लेकिन अमेरिका और ईरान ने इसे स्वीकार नहीं किया है। ईरान ने इस पर हस्ताक्षर तो किए हैं, पर इसे अनुमोदित नहीं किया, जबकि अमेरिका ने न तो हस्ताक्षर किए हैं और न ही अनुमोदन।
ईरान का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर यूएनसीएलओएस से पहले के अंतरराष्ट्रीय कानून लागू होते हैं, विशेष रूप से 1949 के ‘कॉर्फू चैनल’ मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का निर्णय और 1958 का क्षेत्रीय सागर समझौता। इन प्रावधानों के तहत विदेशी जहाजों को ‘सीधा मार्ग’ (इनोसेंट पैसेज) का अधिकार प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि वे किसी अन्य गतिविधि के बिना और तटीय देशों की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाए बिना गुजर सकते हैं।
इन नियमों के तहत ईरान और ओमान को समुद्री मार्ग के उपयोग को लेकर कुछ नियम बनाने और लागू करने का अधिकार है, जैसे सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी प्रावधान। हालांकि, उन्हें सीधे मार्ग को अवरूद्ध करने का अधिकार नहीं है।
इसके विपरीत, ईरान अपने जल क्षेत्र के हिस्से में मार्ग को “निलंबित” करने का अधिकार भी जताता है, जो 1958 की संधि के प्रावधानों के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में ‘इनोसेंट पैसेज’ को रोका नहीं जा सकता।
वहीं, अमेरिका का दृष्टिकोण यूएनसीएलओएस के तहत ‘ट्रांजिट पैसेज’ की अवधारणा पर आधारित है। इसके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में निरंतर और त्वरित आवागमन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, जिसमें समुद्री मार्ग के साथ-साथ हवाई उड़ान और पनडुब्बियों की आवाजाही भी शामिल है।
अमेरिका इस रुख को मजबूत करने के लिए नियमित रूप से नौवहन की स्वतंत्रता अभियान चलाता है, जिनके जरिए वह उन समुद्री दावों को चुनौती देता है, जिन्हें वह अवैध मानता है।
कुछ प्रमुख कानूनी विशेषज्ञ अमेरिका के इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं, हालांकि इस बात पर मतभेद बना हुआ है कि ‘ट्रांजिट पैसेज’ परंपरागत अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा है या नहीं।
ईरान का तर्क है कि भले ही इसे परंपरागत कानून माना जाए, लेकिन वह लगातार विरोध करने वाला देश है, इसलिए यह नियम उस पर लागू नहीं होता। ईरान और ओमान ने यूएनसीएलओएस वार्ताओं के दौरान भी ‘सीधे मार्ग’ के पक्ष में और ‘ट्रांजिट पैसेज’ के खिलाफ रुख अपनाया था।
ईरान का यह भी कहना है कि ‘ट्रांजिट पैसेज’ यूएनसीएलओएस से जुड़ा प्रावधान है और केवल वे देश ही इसका लाभ उठा सकते हैं, जिन्होंने इस संधि को अनुमोदित किया है। चूंकि अमेरिका और ईरान दोनों ने इसे अनुमोदित नहीं किया है, इसलिए यह प्रावधान उन पर लागू नहीं होता।
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में मौजूदा सैन्य तनाव और आर्थिक व्यवधान के पीछे यह जटिल कानूनी स्थिति भी एक महत्वपूर्ण कारण है। इसके अलावा, उन देशों की भूमिका भी अहम है, जिनके झंडे वाले तेल टैंकर इस मार्ग से गुजरते हैं, क्योंकि उन्हें भी समुद्री कानून के तहत अपने दायित्वों और हितों का संतुलन बनाना होता है।
हर देश अपने दीर्घकालिक हितों के खिलाफ जाने वाले किसी भी कानूनी उदाहरण से बचना चाहता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रभावी संचालन के लिए आवश्यक है कि देशों के बीच नियमों को लेकर स्पष्ट सहमति बने और उनका पालन सुनिश्चित किया जाए।
विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिर स्थिति स्थापित करने के लिए साझा कानूनी समझ और प्रतिबद्धता जरूरी होगी, हालांकि इस दिशा में आगे बढ़ना आसान नहीं माना जा रहा है।
(द कन्वरसेशन) मनीषा सुभाष
सुभाष