( जोआने ऑरलैंडो, वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी )
सिडनी, 12 मई (द कन्वरसेशन) क्या आप हर समय स्क्रीन देखते रहते हैं? आज के समय में ईमेल भेजने से लेकर खाना ऑर्डर करने तक, लगभग हर काम के लिए लोग तकनीक पर निर्भर हैं। लेकिन लगातार ऑनलाइन जुड़े रहना शारीरिक और मानसिक थकान का कारण बन सकता है।
इसी वजह से कुछ लोग “डिजिटल डिटॉक्स” अपना रहे हैं। इसका मतलब है एक निश्चित अवधि तक मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना।
यह अवधारणा ऑनलाइन तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसके समर्थक “एनालॉग लाइफस्टाइल” के स्वास्थ्य लाभों का प्रचार कर रहे हैं। कुछ लोग बेहतर स्वास्थ्य और खुशी पाने के उद्देश्य से महंगे “डिजिटल रिट्रीट” कार्यक्रमों में भी हिस्सा ले रहे हैं।
हालांकि सवाल यह है कि क्या ‘डिजिटल डिटॉक्स’ वास्तव में असरदार है या सेहत की बात करने वाला एक और चलन भर है।
क्या है ‘डिजिटल डिटॉक्स’?
“डिजिटल डिटॉक्स” शब्द ‘डिटॉक्सिफिकेशन’ से आया है, जिसका अर्थ है किसी व्यक्ति को शराब या नशीले पदार्थ जैसी लत से सुरक्षित तरीके से बाहर निकालना। यह प्रक्रिया आमतौर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की देखरेख में की जाती है।
इसी तरह डिजिटल डिटॉक्स का उद्देश्य तकनीक से कुछ समय के लिए दूरी बनाना, कम व्यवधानों के साथ जीवन का अनुभव करना और ऑफलाइन रिश्तों को मजबूत करना है।
तकनीक से जुड़ी समस्या
ऑस्ट्रेलिया में युवा औसतन रोजाना नौ घंटे स्क्रीन देखते हैं। शोध बताते हैं कि वयस्क भी इससे बहुत पीछे नहीं हैं। 45 से 64 वर्ष आयु वर्ग के ऑस्ट्रेलियाई प्रतिदिन करीब छह घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं।
इसका परिणाम यह है कि अधिक लोग “इन्फॉर्मेशन ओवरलोड” यानी अत्यधिक सूचनाओं के कारण मानसिक और भावनात्मक दबाव महसूस कर रहे हैं। इससे जुड़ी एक और स्थिति “सोशल मीडिया फटीग” है, जो लगातार ऑनलाइन जुड़े रहने से पैदा होती है।
हालांकि कुछ संकेत यह भी बताते हैं कि लोग तकनीक के प्रभाव का विरोध करने लगे हैं। कई युवा स्क्रीन छोड़कर बुनाई, शतरंज क्लब और अन्य ऑफलाइन गतिविधियों की ओर लौट रहे हैं।
कुछ नए ऑनलाइन रुझान भी सामने आए हैं, जैसे “रॉ-डॉगिंग बोरडम”, जिसमें लोग लंबी उड़ानों के दौरान बिना हेडफोन के समय बिताते हैं। वहीं “फ्रिक्शन-मैक्सिंग” का विचार भी लोकप्रिय हो रहा है, जिसके अनुसार कठिन काम करने से व्यक्ति अधिक मजबूत और सक्षम बनता है।
इस लिहाज से ‘डिजिटल डिटॉक्स’ को भी एक नया ऑनलाइन चलन माना जा सकता है।
क्या ‘डिजिटल डिटॉक्स’ असरदार है?
मौजूदा शोध बताते हैं कि ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के कुछ फायदे हो सकते हैं, हालांकि इसके प्रमाण अभी पूरी तरह निर्णायक नहीं हैं।
2025 में किए गए एक मेटा-विश्लेषण में 20 नियंत्रित अध्ययनों की समीक्षा की गई। इसमें पाया गया कि सोशल मीडिया से थोड़े समय का ब्रेक लेने से लोगों में जीवन संतुष्टि और आत्मसम्मान में हल्का लेकिन सकारात्मक सुधार देखा गया। प्रतिभागियों ने चिंता, अवसाद और अकेलेपन के अहसास में कमी महसूस की।
एक अन्य अध्ययन (2025) में शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के स्मार्टफोन दो सप्ताह के लिए इस तरह सीमित कर दिए कि वे केवल कॉल और संदेश प्राप्त कर सकें। अध्ययन में पाया गया कि इससे मानसिक स्वास्थ्य पर अवसाद रोधी दवाओं से भी अधिक सकारात्मक असर पड़ा।
शोधकर्ताओं के अनुसार इसका कारण केवल फोन का कम इस्तेमाल नहीं था, बल्कि उस समय का उपयोग सामाजिक मेलजोल, व्यायाम और प्रकृति के बीच रहने जैसी लाभकारी गतिविधियों में करना भी था।
हर किसी पर एक जैसा असर नहीं
‘डिजिटल डिटॉक्स’ का प्रभाव अलग-अलग लोगों पर अलग हो सकता है। इसके पीछे कई कारण हैं।
एक कारण सांस्कृतिक संदर्भ है। शोध बताते हैं कि तुर्किये जैसे सामूहिक संस्कृति वाले देशों में सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले लोग जल्दी जवाब देने और बड़े नेटवर्क बनाए रखने का अधिक सामाजिक दबाव महसूस करते हैं। इसलिए ऐसे समाजों में रहने वाले लोगों को सोशल मीडिया से ब्रेक लेने से अधिक लाभ हो सकता है।
लिंग के आधार पर भी फर्क देखा गया है। शोध बताते हैं कि महिलाएं सोशल मीडिया का इस्तेमाल मुख्य रूप से रिश्ते बनाए रखने और दूसरों से अपनी शारीरिक बनावट की तुलना करने के लिए करती हैं। इसलिए पुरुषों की तुलना में उन्हें ‘डिजिटल डिटॉक्स’ से अधिक फायदा हो सकता है।
साल 2020 के एक अध्ययन में पाया गया कि एक सप्ताह तक इंस्टाग्राम से दूर रहने वाली महिलाएं अपने जीवन में अधिक संतुष्ट महसूस कर रही थीं, जबकि पुरुषों में ऐसा प्रभाव नहीं देखा गया।
तरीका सबसे महत्वपूर्ण
शोध बताते हैं कि ‘डिजिटल डिटॉक्स’ मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे अपनाने का तरीका महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों के अनुसार तकनीक को अचानक पूरी तरह छोड़ देना सही नहीं है, क्योंकि ऐसे बदलाव लंबे समय तक टिक नहीं पाते। 2023 के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने प्रतिदिन स्मार्टफोन इस्तेमाल का समय एक घंटा कम किया, उनमें मानसिक स्वास्थ्य लाभ अधिक मजबूत और टिकाऊ रहे, जबकि पूरी तरह फोन छोड़ने वालों में ऐसा नहीं देखा गया।
विशेषज्ञ ‘डिजिटल डिटॉक्स’ को सफल बनाने के लिए कुछ सुझाव देते हैं:
(1) बार-बार फोन देखने जैसी खराब आदतों की पहचान करें।
(2) ऐप इस्तेमाल की समय सीमा तय करें या संदेश देखने का निश्चित समय निर्धारित करें।
(3) स्पष्ट लक्ष्य बनाएं, जैसे एक सप्ताह तक इंस्टाग्राम से दूर रहना।
(4) अपने परिवार और दोस्तों को इसके बारे में बताएं ताकि वे सहयोग कर सकें।
(5) अपनी प्रगति पर नजर रखें और देखें कि क्या आपकी चिंता कम हुई है या नींद बेहतर हुई है।
डिजिटल दुनिया में लगातार मौजूद रहना और संतुलन बनाए रखना आसान नहीं है। लेकिन ‘डिजिटल डिटॉक्स’ लोगों को तकनीक को लेकर अधिक जागरुक और संतुलित तरीके से इस्तेमाल करने में मदद कर सकता है। इसका उद्देश्य तकनीक को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उसका अधिक सोच-समझकर उपयोग करना है।
द कन्वरसेशन मनीषा वैभव
वैभव