पटनाः Sheetla Mata Temple Accident बिहार के नालंदा से एक ऐसी खबर आई जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जहां एक ओर पूरा जिला राष्ट्रपति के स्वागत की तैयारियों में डूबा था, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की एक बड़ी अनदेखी ने 9 परिवारों के चिराग बुझा दिए शीतला माता मंदिर में मची भगदड़ ने आस्था को मातम में बदल दिया है। 8 महिलाओं और एक पुरुष की इस हादसे में जान चली गई है। आखिर इस मौत के खेल का जिम्मेदार कौन है?
Sheetla Mata Temple Accident चैत्र महीने के आखिरी मंगलवार को आयोजित मघड़ा मेले में उम्मीद थी कि हजारों की भीड़ आएगी, लेकिन प्रशासन ने इस भीड़ को उनके हाल पर छोड़ दिया। चश्मदीदों की मानें तो मंदिर परिसर में न तो बैरिकेडिंग थी और न ही सुरक्षाकर्मी। ऊपर से भ्रष्टाचार का आरोप ये कि पुजारी पिछले दरवाजे से पैसे लेकर दर्शन करा रहे थे। कतार में खड़ी भीड़ का सब्र टूटा, धक्का-मुक्की हुई और देखते ही देखते लाशों के ढेर लग गए। दम घुटने और पानी की कमी से महिलाएं बेहोश होकर गिरने लगीं और फिर मौत का तांडव शुरू हुआ। सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा के दोहरे मापदंड पर उठ रहा है कि जिस वक्त मंदिर में 10 हजार लोग अपनी जान बचाने के लिए जूझ रहे थे, वहां एक भी पुलिसकर्मी नहीं था, जबकि महज 30 किलोमीटर दूर राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए 8 जिलों की पुलिस और ढाई हजार जवान मुस्तैद थे। क्या आम जनता की जान की कीमत सिस्टम के लिए कुछ भी नहीं?
लापरवाही का आलम ये कि हादसे के 40 मिनट बाद पहली एंबुलेंस पहुंची। अगर समय पर इलाज मिलता तो शायद मरने वालों का आंकड़ा इतना बड़ा न होता। फिलहाल दीपनगर SHO को सस्पेंड कर दिया गया है और मुआवजे का मरहम लगाया जा रहा है, लेकिन उन नौ घरों के अंधेरे को शायद ही कोई सरकार भर पाए। सरकार ने जांच के लिए SIT गठित कर दी है, लेकिन सवाल वही है कि क्या हर हादसे के बाद सिर्फ एक थानेदार को सस्पेंड कर देना काफी है? या फिर उन बड़े अधिकारियों पर भी गाज गिरेगी जिन्होंने 10 हजार की भीड़ के इनपुट को नजरअंदाज किया।