पटना की भुला दिये गए एकल पर्दा सिनेमाघरों से रूबरू करा रही ‘दास्तान-ए-पटना टॉकीज’

Ads

पटना की भुला दिये गए एकल पर्दा सिनेमाघरों से रूबरू करा रही ‘दास्तान-ए-पटना टॉकीज’

  •  
  • Publish Date - June 19, 2026 / 05:58 PM IST,
    Updated On - June 19, 2026 / 05:58 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

पटना, 19 जून (भाषा) पटना की मौजूदा पीढ़ी को शहर के भूले-बिसरे सांस्कृतिक केंद्रों से रूबरू कराने की कोशिश के तहत अब ध्वस्त हो चुके एकल पर्दा वाले सिनेमाघरों की दुर्लभ तस्वीरों, पुराने टिकटों और इनसे जुड़े अन्य दस्तावेजों की यहां एक प्रदर्शनी लगाई गई है।

‘दास्तान-ए-पटना टॉकीज’ शीर्षक वाली यह प्रदर्शनी पटना के उस गौरवशाली दौर पर प्रकाश डालती है, जब यह शहर फिल्म प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। साथ ही यह बदलते समय, डिजिटल तकनीक और मल्टीप्लेक्स संस्कृति के आगमन के कारण इस विरासत के धीरे-धीरे लुप्त होने की कहानी भी बयां करती है।

प्रदर्शनी में पटना के कुछ सबसे प्रतिष्ठित एकल पर्दा सिनेमाघरों का इतिहास दर्शाया गया है। इनमें गांधी मैदान के निकट स्थित ‘एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस’ (पटना का सबसे पुराना सिनेमाघर, जिसे बाद में केवल ‘एलफिंस्टन’ के नाम से जाना गया), ‘रीजेंट सिनेमा’ (जिसकी शुरुआत 1929 में ‘पैलेस ऑफ वैरायटीज’ के रूप में हुई बताई जाती है), 1940 के दशक का आर्ट डेको शैली वाला ‘पर्ल सिनेमा’ (जिसे 2012 में ध्वस्त कर दिया गया), बाकरगंज क्षेत्र का ‘रूपक सिनेमा’ और पटना-गया रोड स्थित ‘अशोक सिनेमा’ शामिल हैं।

‘एलफिंस्टन’ सिनेमाघर को ‘एलफिंस्टन बायोस्कोप कंपनी’ अथवा पारसी सिनेमा अग्रदूत जे. एफ. मदन की ‘मदान थिएटर्स’ संचालित करती थी। इसे करीब एक दशक पहले ध्वस्त कर दिया गया था। उसके स्थान पर नये भवन का निर्माण किया गया है, जो पुराने नाम से ही संचालित होता है।

‘एलफिंस्टन’ में नाटकों और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की भी व्यवस्था थी। कई सिनेमा विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी शुरुआत एक रंगमंच के रूप में हुई थी और बाद में इसे सिनेमाघर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा।

दस्तावेजों के अनुसार, नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने मार्च 1936 में पटना प्रवास के दौरान अपने दल के साथ इसी थिएटर में नृत्य-नाटिका ‘चित्रांगदा’ का मंचन किया था।

प्रदर्शनी में भरतनाट्यम की विख्यात नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरुण्डले के 12 नवंबर 1941 को एलफिंस्टन में आयोजित कार्यक्रम के दुर्लभ निमंत्रण पत्र की तस्वीर भी प्रदर्शित की गई है। इसके अलावा, 1941 की फिल्म ‘मेजर बारबरा’, जो जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के इसी नाम के नाटक पर आधारित थी, के रीजेंट सिनेमा में प्रदर्शन से संबंधित एक पुराना पोस्टर भी प्रदर्शनी का हिस्सा है।

रीजेंट सिनेमा के आधुनिकीकरण से पहले की एक दुर्लभ तस्वीर भी प्रदर्शनी में लगाई गई है।

इसके अतिरिक्त, ‘एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस, पटना’ प्रबंधन द्वारा उस दौर के प्रसिद्ध व्यवसायी राय बहादुर राधा कृष्ण जालान को 23 सितंबर 1938 को फिल्म ‘बागबान’ के विशेष प्रदर्शन के लिए भेजे गए निमंत्रण पत्र की प्रति सहित कई अन्य दुर्लभ वस्तुएं भी प्रदर्शित की गई हैं।

कोलकाता में रहने वाले पटना के वरिष्ठ फोटोग्राफर और प्रदर्शनी के ‘क्यूरेटर’ राजीव सोनी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि उन्होंने इन सिनेमाघरों के मालिक परिवारों के वर्तमान सदस्यों से संपर्क कर उनसे पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज और अन्य सामग्री प्राप्त की।

उन्होंने बताया कि 1938 का वह निमंत्रण पत्र राय बहादुर राधा कृष्ण जालान के प्रपौत्र आदित्य जालान के निजी संग्रह का हिस्सा है। आदित्य जालान पटना सिटी स्थित ऐतिहासिक ‘किला हाउस’ के निवासी हैं।

एक समय अपने एकल पर्दे सिनेमाघरों पर गर्व करने वाला पटना पिछले कुछ दशकों में खामोशी से मल्टीप्लेक्स संस्कृति की ओर बढ़ा है। स्वतंत्रता के बाद बना वीणा सिनेमा, जो कभी हॉलीवुड फिल्मों के प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध था और बाद में अस्तित्व बचाने के लिए बी-ग्रेड फिल्मों के मैटिनी शो चलाने लगा, तथा दानापुर का डायना सिनेमा और पटना सिटी का कृष्णा टॉकीज किसी तरह अब भी अस्तित्व में हैं। इन्हें भी इस प्रदर्शनी में स्थान दिया गया है। यह प्रदर्शनी कुछ सप्ताह पहले अर्थशिला पटना में शुरू हुई थी।

पटना की विरासत पर पुस्तक लिख चुके सोनी ने खेद व्यक्त किया कि शहर के ऐतिहासिक सिनेमाघर, जो कभी सार्वजनिक पहचान के प्रमुख केंद्र थे, आधुनिकता की आंधी में टिक नहीं सके।

आयोजकों के अनुसार, यह प्रदर्शनी केवल अभिलेखीय सामग्री का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एकल पर्दा स्क्रीन सिनेमाघरों और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियों को संरक्षित करने का प्रयास है।

भाषा कैलाश

धीरज

धीरज