पटना, 12 अप्रैल (भाषा) बिहार में रविवार को राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ता दिखा क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई है। संभावना जताई जा रही है कि इस बैठक के बाद जनता दल यूनाइटेड (जदयू) अध्यक्ष नीतीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोड़ देंगे और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का गठन होगा।
कैबिनेट सचिवालय विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, बैठक सुबह 11 बजे होगी जिसके बाद राज्य के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार राज्यपाल सैयद अता हसनैन को अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं।
नीतीश पिछले सप्ताह राज्यसभा के लिए चुने गए थे। इससे पहले कुमार के करीबी सहयोगी और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने पत्रकारों से कहा था कि नई सरकार के गठन की प्रक्रिया 13 अप्रैल के बाद शुरू होने की संभावना है।
इस बीच, भाजपा ने सक्रियता दिखाते हुए बिहार विधानसभा में विधायक दल का नेता चुनने के लिए शिवराज सिंह चौहान को ‘केंद्रीय पर्यवेक्षक’ नियुक्त किया है, जो सत्ता परिवर्तन की निगरानी करेंगे।
भाजपा राज्य में अपने पहले मुख्यमंत्री की संभावना को लेकर काफी संयम बरत रही है।
दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि संसदीय बोर्ड ने केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के कई बार मुख्यमंत्री रह चुके चौहान को बिहार में विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।
जदयू के वरिष्ठ नेता और विधायी कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने आज सुबह यहां कहा था, ‘‘नए मुख्यमंत्री का चुनाव राजग द्वारा भाजपा की सिफारिश पर किया जाएगा, जिसमें भाजपा की अहम भूमिका होगी।’’
ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि निवर्तमान सरकार में महत्वपूर्ण गृह मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सबसे आगे हैं।
राज्य के भाजपा नेता, जो हाल के दिनों में लगातार दिल्ली का दौरा कर रहे हैं, अपनी स्थिति को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं।
प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मंत्री दिलीप जायसवाल ने एक दिन पहले कहा था, ‘‘अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, यह फैसला हमारे केंद्रीय नेतृत्व को लेना है। मैं इस दौड़ में बिल्कुल भी नहीं हूं।’’
चौधरी के अलावा, जो दस साल से भी कम समय पहले भाजपा में शामिल हुए थे, अन्य संभावित नेताओं में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय और राज्य मंत्री लखेंद्र पासवान और श्रेयसी सिंह के नाम शामिल हैं।
भाजपा सूत्रों के अनुसार, ये सभी नेता अलग-अलग मायनों में इस पद के लिए उपयुक्त हैं।
चौधरी ‘कोइरी’ जाति से हैं, और उनकी पदोन्नति से यह सुनिश्चित हो सकता है कि कुमार द्वारा अपने 20 साल के शासनकाल में पोषित ‘लव कुश’ (कुर्मी कोइरी) समीकरण जदयू प्रमुख के जाने के बाद भी राजग के पक्ष में बरकरार रहे।
राय संख्या के लिहाज से बिहार की सबसे बड़ी जाति ‘यादव’ समुदाय से है और उनको आगे बढ़ाने से पार्टी का जनाधार बढ़ सकता है। यादव दशकों से लालू प्रसाद के राजद के साथ रहा है जो राज्य में भाजपा का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल है।
सूत्रों ने बताया कि पासवान दलित हैं और उनकी पदोन्नति से भाजपा को अपनी ‘उच्च जाति समर्थक’ छवि से उबरने में मदद मिल सकती है, जिसका हिंदी भाषी क्षेत्रों में एक अलग ही नुकसान है क्योंकि वर्ष 1990 के दशक के मंडल आंदोलन की छाया आज भी कायम है।
सिंह (30 वर्ष) उच्च जाति में शामिल क्षत्रिय समाज से हैं, लेकिन उनकी पदोन्नति को पार्टी द्वारा युवा प्रतिभाओं को प्राथमिकता देने के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा पार्टी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को आगे बढ़ाकर खुद को लैंगिक समानता की समर्थक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है, जो संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करता है।
भाजपा सूत्रों ने स्वीकार किया कि केंद्रीय नेतृत्व द्वारा ‘आश्चर्यजनक’ कदम उठाए जाने की प्रबल संभावना है। उन्होंने पार्टी द्वारा शासित कई राज्यों के उदाहरण दिए, जहां हाल के दिनों में कम लोकप्रिय नेताओं को शीर्ष पद मिले हैं।
अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने बिहार की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘‘हमारे पास यहां बहुत से योग्य लोग हैं लेकिन हमें एक ऐसे बाबा से सावधान रहना चाहिए जो पर्ची लेकर आ सकता है’’। सिन्हा तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं, लेकिन उन्होंने इससे पहले भाजपा में लगभग तीन दशक बिताए हैं।
यह संदर्भ राजस्थान का था जहां दो साल पहले एक विधायक दल की बैठक में भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री नामित किया गया था। इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को कैमरे पर एक कागज का टुकड़ा निकालते हुए देखा गया था जिस पर पहली बार चुने गए विधायक का नाम लिखा हुआ था।
भाषा संतोष नरेश
नरेश