कांग्रेस ने चैन की सांस ली। वरना प्रणब दा ने तो उनकी सांस ही अटका रखी थी। पार्टी के दिग्गज से लेकर टुटपुंजिये नेता तक प्रणब दा को चिचौरीनुमा समझाइश दे रहे थे कि वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रम में ना जाएं। हद तो ये रही कि उनकी बेटी शर्मिष्ठा तक अपने बाप को नहीं समझ सकी। सबको डर बस इसी बात का था कि राष्ट्रपति बनने तक खांटी कांग्रेसी रहे दादा कहीं संघ के मंच से उसकी तारीफ में एकाध शब्द बोलकर पार्टी के संघविरोधी राग को बेसुरा ना कर दें। डर लाजिमी था। पार्टीगत विचारधारा के पूर्वाग्रही बंधनों से मुक्त होकर करीब 6 साल स्वतंत्र चेतना के साथ गुजारने वाले शख्स के सत्यानुभूति से निकले उद्गार खतरनाक भी तो हो सकते थे। लेकिन भला हो प्रणब दा का, कि उन्होंने कांग्रेस की लाज रख ली।
वैसे खतरा दो तरफा था। कयास लगाए जा रहे थे कि भगवा आतंकवाद की थ्योरी गढ़ने वाले कांग्रेसी दस्ते का ये पूर्व सिपाही कहीं संघ के गढ़ में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक ना कर बैठे। लेकिन तारीफ करनी होगी प्रणब दा की, कि उन्होंने अपने भाषण में एक बार भी संघ का नाम लिए बगैर राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का कौशल दिखाया। प्रणब ने अपने भाषण में मौटे तौर पर राष्ट्रवाद के उन्हीं तत्वों को रेखांकित किया जो खुद संघ की विचारधारा के मूलाधार रहे हैं। फिर भी खुश होने का बहाना चाहिए तो कांग्रेसी इसी बात से गदगद हैं कि दादा ने संघ के मंच से जवाहरलाल नेहरू के राष्ट्रवाद का उल्लेख करके संघ को आइना दिखा दिया। अब कांग्रेसियों को कौन समझाए कि जिस डॉ हेडगेवार को वे खलनायक निरूपित करते हैं उन्हीं हेडगेवार को प्रणब दा ने भारत मां का सच्चा सपूत भी तो बताया है।
दरअसल, प्रणब दा के उद्बोधन में संकीर्ण नजरिए तलाशने की बजाए उसे व्यापक दृष्टिकोण से देखे जाने की जरूरत है। संघ के लिए गैरसंघीय विचारधारा से जुड़ी शख्सियत को अपने कार्यक्रमों में बुलाना कोई नई बात नहीं है। इसके पहले भी विरोधी विचारधारा से जुड़ी हस्तियां संघ के आयोजनों में आती रही हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को बुलाना भी उसी परंपरा का विस्तार था। घनघोर वैचारिक असहिष्णुता के दौर में इस सिलसिले को जारी रखने की जरूरत है। कुछ तुम कहो, कुछ मैं सुनूं। कुछ मैं कहूं, कुछ तुम सुनो। ये कहना-सुनना ही तो कहा-सुनी का निदान है।
प्रणब दा ने संघ के कार्यक्रम में शामिल होकर संघ के प्रति जानने की उत्सुकता को जगाया है। लोगों ने गूगल में संघ को सर्च तो किया ही, टीवी और अखबारों में भी संघ को लेकर सकारात्मक माहौल बना। सबसे रोचक बात ये रही कि संघ प्रमुख भागवत के नाम तक से चिढ़ने वाले कथित धर्मनिरपेक्षवादी भी मुंह फुलाए ही सही टीवी में उनका भाषण सुनते रहे। दरअसल, संघ के प्रति नफरत की हद तक इतना वैचारिक कचरा फैलाया गया कि लोग उसी को सच मान बैठे। समरसता की दुहाई देने वालों के बौद्धिक दोगलापन का आलम ये रहा कि इन्होंने संघ को ही अछूत बना दिया। RSS की विचारधारा को कसैला पानी पीकर कोसने वाले किसी भी संघविरोधी मित्र से पूछो, भैया! क्या तुमने RSS को करीब से जाना है तो उसका तिरस्कार के साथ जवाब यही रहता है कि उसे जानने की जरूरत है भी नहीं। लेकिन अब जबकि संघ की स्वीकार्यता का विस्तार हुआ है, प्रणब मुखर्जी ने उसके कार्यक्रम में सहभागी बनकर वैचारिक अस्पृश्यता की उसी बुराई को दरकिनार करते हुए परस्पर विरोधी विचारधाराओं में सार्थक संवाद की संभावना को मजबूत किया है। दादा की इस दमदार पहल का तो स्वागत होना चाहिए।
सौरभ तिवारी
असिस्टेंट एडिटर, IBC24