नई दिल्ली: never Deny for Cash Deposit बैंक के ग्राहकों को ज्यादा से ज्यादा सुविधा प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार डिजिटाइजेशन पर फोकस कर रही है। अब ऐसा है कि आधे से ज्यादा काम ग्राहक खुद कर रहे हैं। बावजूद इसके किसी भी काम के लिए ग्राहकों को कई काम के लिए बैंक के कर्मचारियों से दो चार होना पड़ता है। ऐसा ही कुछ इंदौर के एक खाताधारक के साथ हुआ, जिसके बाद उसने बैंक को ऐसी सबक सिखाई कि तीन साल तक बैंक के चक्कर काटने पड़ गए। इतना ही नहीं बैंक पर जुर्माना भी लगाया गया है। तो चलिए जानते हैं क्या है पूरा माजरा?
never Deny for Cash Deposit दरअसल पत्रकार कॉलोनी स्थित बैंक ऑफ इंडिया के एक खाताधारक 1 अक्टूबर 2019 को कैश जमा करने गया हुआ था। लंबी लाइन में खड़े होकर 20 मिनट इंतजार करने के बाद खाताधारक का नंबर आया, लेकिन जैसे ही कैश काउंटर पर पहुंचा बैंककर्मी ने पैसे जमा करने से इंकार कर दिया। कैश काउंटर पर बैठे कर्मचारी ने ये कहते हुए पैसे जमा करने से इंकार कर दिया कि बाहर मशीन लगी है वहां से पैसे डिपॉजिट कर दीजिए। युवक ने पहले बैंक के बाहर कैश डिपॉजिट मशीन में कोशिश की, लेकिन एटीएम नहीं होने के चलते पैसे जमा नहीं हो पाया। मशीन में भी टेक्नीकल दिक्कत थी। इस वजह से रुपए जमा नहीं हो रहे थे।
युवक ने बताया कि जब मैंने बैंक कर्मचारी को बताया कि मशीन खराब है, रुपए जमा नहीं हो रहे हैं। मेरे पास एटीएम भी नहीं है। उन्होंने कहा कि आप दूसरी ब्रांच में जाइए वहां मशीन होगी। मैंने बैंक मैनेजर से बात की। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का नया नियम आ गया है। काउंटर पर कैश जमा नहीं होगा। डिजिटल मोड से ही आपको ट्रांजेक्शन करना होगा। मैंने नियम की कॉपी मांगी तो उन्होंने अभद्रता की। स्टाफ से कहा कि इन्हें बाहर निकालिए। उसके बाद मैंने उनसे कहा कि ठीक है आप कैश डिपाजिट नहीं कर रहे हैं तो मुझे लिखकर दे दीजिए। उन्होंने मेरी डिपॉजिट पर्ची के पीछे लिखकर दे दिया कि काउंटर पर कैश डिपाजिट नहीं होगा। आप ग्रीन चैनल से या मशीन से ही कैश डिपॉजिट करें। इसके बाद मैं वापस आ गया। बाहर मैंने देखा कि काफी लोग परेशान हो रहे थे। मशीन खराब होने की वजह से कैश डिपाजिट नहीं हो रहा था। मैंने नियम के बारे में पता किया। मुझे जानकारी मिली कि ऐसा कोई नियम सरकार ने नहीं बनाया है। यह जरूर है कि लोगों को जागरूक करना है कि डिजिटल ट्रांजेक्शन करें लेकिन यह कहीं नहीं लिखा है कि पर्ची से रुपए जमा नहीं होंगे। उसके बाद मेंने कानूनी लड़ाई लड़ने मन बनाया।
नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन में मैंने शिकायत की। इस बैंक की तरफ से जवाब दिया गया कि हम भारत सरकार की डिजिटल योजना बढ़ावा देने के लिए उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं। लेकिन हमारा ऐसा कोई नियम नहीं है। जबकि बैंक ने मुझे पर्ची के पीछे लिख कर दिया था। उसके बाद शिकायत बंद कर दी गई। फिर मैंने कंज्यूमर फोरम का बैंक को एक लीगल नोटिस भेजा। बैंक ने जवाब दिया कि हम काउंटर पर कैश जमा करते हैं ऐसा कोई नियम नहीं है, जब मैंने उन्हें बताया कि आपके यहां से बैंक मैनेजर ने मुझे लिखकर दिया है तो उस पर चुप्पी साध ली, कोई जवाब नहीं दे रहे थे। बैंक का सकारात्मक जवाब नहीं आया तो कंज्यूमर फोरम में मैंने केस फाइल किया।
कंजूमर फोरम में केस लगाने के बाद बैंक को नोटिस जारी हुआ। उसके बाद भी बैंक ने गलती नहीं मानी। पर्ची पर लिख कर दिया था उसका कोई खंडन नहीं किया। वे अपने हर जवाब में यही कहते रहे कि हम भारत सरकार की डिजिटल योजना को बढ़ावा दे रहे हैं। लोगों को जागरूक कर रहे हैं। बैंक ने ये बताया कि मैं अनावश्यक विवाद पैदा कर रहा हूं, ऐसा कोई मामला नहीं है। हम ग्राहकों की सेवा करते हैं। बैंक कभी जवाब तो कभी बहस के लिए समय लेती रही। केस चलता रहा 3 साल में 14-15 पेशियां हुई।
आखिरकार 3 साल के बाद कंज्यूमर फोरम ने आदेश पारित किया। फोरम ने कहा कि डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देना लाभ का विषय है। लेकिन बैंक ने जो किया है वह निश्चित रूप से सेवा में कमी है। बैंक का अपने ग्राहकों के प्रति व्यवहार भी ठीक नहीं है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया राष्ट्रीय कृत बैंक है तो आपसे ग्राहकों से बेहतर बात करने और अच्छी सेवाएं देने की अपेक्षा की जाती है। उसमें कमी पाई गई इसलिए बैंक पर 2 हजार रुपए का हर्जाना लगाया है। 1 हजार रुपए कानूनी खर्च के भी देना होंगे। आदेश का पालन समय पर नहीं हुआ तो बैंक को 8 प्रतिशत की राशि ब्याज सहित देना होगी।