बैंक कर्मचारी संगठनों ने अधिकारियों के पीएलआई भुगतान के ‘विभाजनकारी’ फॉर्मूले को खारिज किया
बैंक कर्मचारी संगठनों ने अधिकारियों के पीएलआई भुगतान के ‘विभाजनकारी’ फॉर्मूले को खारिज किया
नयी दिल्ली, 19 मार्च (भाषा) बैंक कर्मचारी संगठनों के संयुक्त मंच यूएफबीयू ने बृहस्पतिवार को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग के पीएलआई को लेकर निर्देश पर गंभीर चिंता और आपत्ति जताई। निर्देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को स्केल चार और उससे ऊपर के पात्र अधिकारियों को पीएलआई (प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन) का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।
विभाग ने बुधवार को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन के संबंध में निर्देश जारी किया।
यूएफबीयू ने मांग की है कि स्थापित परामर्श व्यवस्था के माध्यम से समाधान होने तक इसके कार्यान्वयन को स्थगित रखा जाए।
यूएफबीयू ने बयान में कहा कि यह निर्देश अनुचित है, क्योंकि पीएलआई का मामला मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय) कार्यालय के समक्ष सुलह कार्यवाही में से विचाराधीन है।
इसमें कहा गया है कि हाल में सुलह बैठक नौ मार्च, 2026 को हुई थी, जिसमें यूनियन और प्रबंधन ने उसी मुद्दे पर विचार-विमर्श किया था जिसे अब एकतरफा रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। हस्ताक्षर किये गये बैठक के ब्योरे में स्पष्ट रूप से लिखा है कि वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पीएलआई का मामला विचाराधीन है और सुलह और द्विपक्षीय प्रक्रिया के माध्यम से आगे की कार्यवाही की जाएगी।
अब वित्तीय सेवा विभाग द्वारा केवल नौ दिन बाद कार्यान्वयन निर्देश जारी करना सुलह प्रक्रिया को निरर्थक बना देता है।
यह निर्देश कई बैठकों की चर्चाओं और बैठक के ब्योरे की भी अवहेलना करता है, जिनमें डीएफएस प्रतिनिधि, आईबीए, बैंक प्रबंधन और सभी यूनियन के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये थे।
यूएफबीयू ने कहा कि सुलह कार्यवाही औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए विधिवत मान्यता प्राप्त मंच है और इसके लंबित रहने के दौरान किसी विवादित योजना को एकतरफा रूप से लागू करने की कोई भी कार्रवाई औद्योगिक शांति के लिए नुकसानदायक है।
संगठन ने चेतावनी दी कि ऐसा कदम बैंकिंग क्षेत्र में अशांति को बढ़ा सकता है और कर्मचारियों को अपने अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए आगे लोकतांत्रिक और विधि सम्मत आंदोलन का सहारा लेने के लिए विवश कर सकता है।
यूएफबीयू ने वित्तीय सेवा विभाग, भारतीय बैंक संघ और सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रबंधन से आग्रह किया कि वे 18 मार्च, 2026 के निर्देश को एकतरफा रूप से लागू करने से बचें और इसके बजाय स्थापित परामर्श और सुलह व्यवस्था के माध्यम से पीएलआई के मुद्दे को इस तरह से हल करें जिससे मौजूदा समझौतों की गरिमा बनी रहे।
उल्लेखनीय है कि संशोधित पीएलआई योजना बैंकिंग क्षेत्र के कर्मचारियों या ट्रेड यूनियनों द्वारा कभी भी उठाई गई मांग नहीं थी।
यह योजना ऊपर से थोपी गई है और इसका उद्देश्य स्केल चार और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए एक सुस्थापित, सामूहिक रूप से बातचीत के माध्यम से तय की गई व्यवस्था को व्यक्तिगत प्रदर्शन-आधारित व्यवस्था से बदलना है।
स्पष्ट रूप से, वर्तमान सामान्य प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन से हटकर व्यक्तिगत प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन की ओर बढ़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इससे वरिष्ठ अधिकारियों को अलग-अलग जोखिम श्रेणियों में बांटा जाएगा, जिससे अधिकारी वर्ग के भीतर एक विभाजनकारी वर्गीकरण बनेगा और कार्यबल का सामूहिक स्वरूप कमजोर होगा।
बयान के अनुसार, संशोधित योजना के गंभीर वित्तीय प्रभाव हैं। मौजूदा व्यवस्था के तहत मध्य प्रबंधन तक के कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए पीएलआई अधिकतम 15 दिन के मूल वेतन और महंगाई भत्ते तक सीमित है।
इसके विपरीत, डीएफएस की योजना में स्केल चार और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए 365 दिन के मूल वेतन तक पीएलआई का प्रावधान है। इससे वित्तीय व्यय में संभावित रूप से लगभग पंद्रह गुना तक की वृद्धि हो सकती है।
यूएफबीयू ने कहा कि ऐसे समय में जब बैंकिंग उद्योग विवेकपूर्ण मानदंडों, लागत दक्षता, पूंजी अनुशासन और सतत वृद्धि पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, अधिकारियों के एक चुनिंदा वर्ग के लिए पारिश्रमिक के एक ही घटक में इस तरह की असमान वृद्धि औचित्य, सूझबूझ और संचालन के स्तर पर वैध सवाल उठाती है।
भाषा रमण अजय
अजय

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