High Court Sperm Preservation Order: पति का स्पर्म अपने पास रख सकेगी पत्नी! महिला ने मां बनने को लेकर जताई चिंता तो हाईकोर्ट ने दी अनुमति, जानिए क्या है पूरा मामला

पति का स्पर्म अपने पास रख सकेंगी पत्नी! महिला ने मां बनने को लेकर जताई चिंता तो हाईकोर्ट ने दी अनुमति, High Court Sperm Preservation Order

High Court Sperm Preservation Order: पति का स्पर्म अपने पास रख सकेगी पत्नी! महिला ने मां बनने को लेकर जताई चिंता तो हाईकोर्ट ने दी अनुमति, जानिए क्या है पूरा मामला
Modified Date: March 19, 2026 / 09:59 pm IST
Published Date: March 19, 2026 8:41 pm IST

कोच्चि। High Court Sperm Preservation Order: केरल हाई कोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश देते हुए एक महिला को अपने ‘ब्रेन डेड’ पति के स्पर्म (शुक्राणु) सुरक्षित रखने की अनुमति दे दी है। अदालत ने कोझिकोड के संबंधित अस्पताल को निर्देश दिया है कि वह मान्यता प्राप्त ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी’ (ART) क्लिनिक के माध्यम से गैमीट्स (प्रजनन कोशिकाएं) निकालकर उन्हें संरक्षित करने की प्रक्रिया पूरी करे।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उसके पति को चिकन पॉक्स के दो सप्ताह बाद ‘एक्सटेंसिव सेरेब्रल वीनस थ्रोम्बोसिस’ की गंभीर समस्या हो गई, जिसके चलते उन्हें ‘ब्रेन डेड’ घोषित किया गया और फिलहाल वे वेंटिलेटर पर हैं। महिला ने कोर्ट को बताया कि मौजूदा स्थिति में उसके पति असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) एक्ट की धारा 22 के तहत आवश्यक लिखित सहमति देने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में यदि प्रक्रिया में देरी होती है, तो उसके मां बनने और पति के पिता बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।

कड़ी शर्तों के साथ मिली राहत

High Court Sperm Preservation Order: अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केवल गैमीट्स निकालने और उन्हें सुरक्षित रखने की अनुमति दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ART एक्ट के तहत आगे की किसी भी प्रजनन प्रक्रिया जैसे IVF के लिए अलग से न्यायालय की अनुमति आवश्यक होगी। मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है, जिसमें विस्तृत कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाएगा।

क्यों महत्वपूर्ण है फैसला

भारत में प्रजनन संबंधी प्रक्रियाओं के लिए सामान्यतः पति-पत्नी दोनों की लिखित सहमति अनिवार्य होती है। ऐसे में ‘ब्रेन डेड’ व्यक्ति की स्थिति में सहमति संभव नहीं होती। इस संदर्भ में हाई कोर्ट का यह आदेश भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।

इन्हें भी पढ़ेंः


लेखक के बारे में

सवाल आपका है.. पत्रकारिता के माध्यम से जनसरोकारों और आप से जुड़े मुद्दों को सीधे सरकार के संज्ञान में लाना मेरा ध्येय है। विभिन्न मीडिया संस्थानों में 10 साल का अनुभव मुझे इस काम के लिए और प्रेरित करता है। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रानिक मीडिया और भाषा विज्ञान में ली हुई स्नातकोत्तर की दोनों डिग्रियां अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए गति देती है।