नयी दिल्ली, 12 सितंबर (भाषा) ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग तेज कर दी है। विस्तारित ब्रिक्स समूह व्यापार के विखंडन और भू-राजनीतिक तनाव के बीच अधिक आर्थिक मजबूती हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।
अगस्त में जयपुर और 10 सितंबर को मुंबई में हुई बैठकों के बाद जारी संयुक्त बयान में वित्त मंत्रियों तथा केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने कहा कि ब्रिक्स की विस्तारित सदस्यता से समूह की विविधता एवं प्रतिनिधित्व मजबूत हुआ है। उन्होंने करीबी आर्थिक और वित्तीय सहयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत की 2026 की अध्यक्षता में ब्रिक्स अपने बढ़ते आर्थिक प्रभाव को भुगतान, विकास वित्त, बुनियादी ढांचे, कराधान, सीमा शुल्क और वित्तीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में अधिक व्यावहारिक सहयोग में बदलने की कोशिश कर रहा है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ब्रिक्स में अब 11 सदस्य ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब हैं। इन देशों की हिस्सेदारी दुनिया की आबादी में करीब 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में 26 प्रतिशत है।
वित्त प्रमुखों ने चेतावनी दी कि भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार के विखंडन, संरक्षणवाद, नीतिगत अनिश्चितता, राजकोषीय एवं मुद्रास्फीति संबंधी दबाव, बढ़ते कर्ज और वित्तीय कमजोरियों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने जोखिम बढ़ गए हैं।
उन्होंने एकतरफा शुल्क एवं गैर-शुल्क उपायों को लेकर ‘‘गंभीर चिंता’’ जताई और कहा कि ऐसे कदम व्यापार को विकृत करते हैं तथा विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के अनुरूप नहीं हैं।
बयान में लंबे समय से जारी ब्रिक्स की इस मांग को प्रमुखता दी गई कि वैश्विक आर्थिक शासन व्यवस्था में ऐसा बदलाव किया जाए, जो उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बढ़ते महत्व को बेहतर ढंग से दर्शाए।
समूह ने ‘ब्रेटन वुड्स इंस्टीट्यूट’- मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक में सुधार का आह्वान किया, ताकि उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व वाला, पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाया जा सके।
संयुक्त बयान में कहा गया, ‘‘हम ब्रेटन वुड्स इंस्टीट्यूट (बीडब्ल्यूआई) में सुधार की तत्काल आवश्यकता दोहराते हैं, ताकि उन्हें अधिक चुस्त, प्रभावी, विश्वसनीय, समावेशी, उद्देश्य के अनुरूप, निष्पक्ष, जवाबदेह और प्रतिनिधित्व वाला बनाया जा सके तथा उनकी वैधता बढ़ाई जा सके।’’
बयान में कहा गया कि बीडब्ल्यूआई में उभरते बाजारों और विकासशील देशों (ईएमडीई) की आवाज एवं प्रतिनिधित्व ‘‘वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनकी सापेक्ष स्थिति को प्रतिबिंबित करना चाहिए।’’
इसमें कहा गया, ‘‘हम बेहतर प्रबंधन प्रक्रियाओं की अपनी मांग भी दोहराते हैं। इसमें योग्यता-आधारित, समावेशी और पारदर्शी चयन प्रक्रिया शामिल है जिससे आईएमएफ और विश्व बैंक के नेतृत्व में क्षेत्रीय विविधता तथा ईएमडीई का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।’’
आईएमएफ के संबंध में ब्रिक्स ने कोटा की 16वीं सामान्य समीक्षा के तहत सहमत कोटा वृद्धि को लागू करने का समर्थन किया और 17वीं समीक्षा के तहत कोटा में सार्थक पुनर्संरेखण की मांग की। समूह ने कहा कि बदलावों से उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के कोटा और मतदान हिस्से में वृद्धि होनी चाहिए तथा सबसे गरीब देशों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए।
समूह ने 2025 की विश्व बैंक शेयरधारिता समीक्षा को विकासशील देशों की आवाज और प्रतिनिधित्व बढ़ाने तथा उनके ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व को दूर करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बताया।
वित्त मंत्रियों ने नव विकास बैंक (एनडीबी) की बड़ी भूमिका का समर्थन किया। यह मूल ब्रिक्स सदस्यों द्वारा स्थापित बहुपक्षीय ऋणदाता है और ब्रिक्स तथा व्यापक वैश्विक दक्षिण में विकास एवं बुनियादी ढांचा वित्तपोषण के साधन के रूप में काम करता है।
केंद्रीय बैंकों ने ब्रिक्स आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था (सीआरए) पर भी काम आगे बढ़ाया। यह एक वित्तीय सुरक्षा तंत्र है, जिसे भुगतान संतुलन संबंधी दबाव का सामना कर रहे सदस्यों को नकदी सहायता उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया गया है।
वित्तीय सहयोग से जुड़े एजेंडे में बीमा, पेंशन, निपटान बुनियादी ढांचा, साइबर सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियां भी शामिल थीं। इससे पता चलता है कि ब्रिक्स का वित्तीय सहयोग पारंपरिक व्यापक आर्थिक नीतियों से आगे बढ़ रहा है।
सदस्यों ने अधिक आत्मनिर्भर ब्रिक्स बीमा परिवेश विकसित करने पर चर्चा की। उन्होंने गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) में स्वैच्छिक ‘ब्रिक्स रिस्क लैब’ स्थापित करने के भारत के प्रस्ताव पर भी विचार किया। इसका उद्देश्य साझा जोखिम मॉडल विकसित करना और पुनर्बीमा क्षमताओं को मजबूत करना है।
भाषा निहारिका योगेश
योगेश