बच्चों को ऑनलाइन सामग्री, विज्ञापन में फर्क करने में होती है परेशानीः एएससीआई रिपोर्ट

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बच्चों को ऑनलाइन सामग्री, विज्ञापन में फर्क करने में होती है परेशानीः एएससीआई रिपोर्ट

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  • Publish Date - March 17, 2026 / 09:42 PM IST,
    Updated On - March 17, 2026 / 09:42 PM IST

मुंबई, 17 मार्च (भाषा) भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) की मंगलवार को जारी एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि आज के बच्चे और किशोर ऑनलाइन सामग्री और विज्ञापन के बीच अंतर समझने में परेशानी महसूस कर रहे हैं।

बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखे जाने की चर्चाएं तेज होने के बीच जारी इस अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, सात से लेकर 12 वर्ष तक के बच्चे स्पष्ट तौर पर नजर आने वाले विज्ञापनों को पहचान लेते हैं, लेकिन उनमें छिपे व्यावसायिक उद्देश्य को नहीं समझ पाते हैं।

वहीं, 13-15 वर्ष के किशोर विज्ञापनों को लेकर अधिक जागरूक होते हैं। लेकिन इसके बावजूद वे भावनात्मक या कहानी पर आधारित ब्रांड संदेशों से प्रभावित हो जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार प्रसारित हो रही डिजिटल सामग्रियों के बीच कम उम्र वाले बच्चों की समझ कम रहती है। इस उम्र के बच्चों के लिए इन्फ्लूएंसर के जरिये किए जाने वाले प्रचार, गेमिंग इंटिग्रेशन और व्लॉग से प्रायोजन अक्सर मनोरंजन जैसा ही लगता है।

फ्यूचरब्रांड्स के साथ मिलकर किए गए अध्ययन के मुताबिक, इस समस्या के समाधान के लिए प्लेटफॉर्म, कंटेंट क्रिएटर, विज्ञापनदाता, अभिभावक और स्कूल, सभी को मिलकर काम करना होगा, ताकि ‘जेन अल्फा’ के लिए मार्केटिंग का एक जिम्मेदार नजरिया सुनिश्चित किया जा सके।

वर्ष 2010 के बाद जन्मे बच्चों की पीढ़ी को ‘जेन अल्फा’ कहा जाता है।

एएससीआई की मुख्य कार्यकारी और महासचिव मनीषा कपूर ने कहा, ‘‘बच्चों के सांस्कृतिक संदर्भ पिछली पीढ़ियों से काफी अलग नजर आते हैं। विज्ञापनों पर उनकी समझ को लेकर जानकारी जुटाना जिम्मेदार जुड़ाव के ढांचे तैयार करने की दिशा में पहला कदम है, क्योंकि वे इस समय देश के सबसे कम उम्र के मीडिया उपभोक्ता हैं।’’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बच्चों की डिजिटल दुनिया में अभिभावकों और शिक्षकों की पकड़ कम हो रही है, जिससे एक तरह की ‘प्राधिकरण रिक्तता’ बन गई है और इसकी जगह गणना-पद्धति (एल्गोरिद्म) ने ले ली है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन और ऑफलाइन अब अलग-अलग दुनिया न रहकर दोनों एक हो चुकी हैं। बच्चों के लिए फोन सिर्फ एक उपकरण न होकर ऐसी जगह बन गया है जहां वे अपनी जिंदगी जीते हैं।

अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि विज्ञापनों को स्पष्ट रूप से चिन्हित करने के लिए ‘सार्वभौम चिह्न निर्धारण’ प्रणाली अपनाई जाए और औपचारिक शिक्षा के जरिये बच्चों में मीडिया साक्षरता विकसित की जाए।

भाषा प्रेम

प्रेम अजय

अजय