मुंबई, 24 सितंबर (भाषा) यूपीआई लेनदेन के कुल मूल्य में से केवल करीब 10 प्रतिशत हिस्से पर ही प्रस्तावित ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर) शुल्क का बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ने की आशंका है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) दिलीप असबे ने बृहस्पतिवार को यह बात कही।
असबे ने ‘13वें एसबीआई बैंकिंग एवं अर्थशास्त्र सम्मेलन 2026′ में कहा कि एमडीआर से मिलने वाली राशि का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा सालाना 1,000 करोड़ रुपये से अधिक कारोबार करने वाले बड़े कारोबारियों से आएगा, जो पहले से ही क्रेडिट कार्ड स्वीकार करते हैं और काफी अधिक शुल्क का भुगतान करते हैं।
यूपीआई प्रणाली का संचालन करने वाली एनपीसीआई के प्रमुख ने एमडीआर के संभावित असर पर कहा, ‘‘उपभोक्ताओं से शुल्क लिए जाने का वास्तविक जोखिम कुल मूल्य का करीब 10 प्रतिशत है।’’
उन्होंने कहा कि यूपीआई लेनदेन की संख्या का करीब 96 प्रतिशत और कुल मूल्य का 75 प्रतिशत फिलहाल शुल्क के दायरे में आने की संभावना नहीं है।
सरकार ने पिछले सप्ताह 2,000 रुपये से अधिक राशि के यूपीआई भुगतान पर कारोबारियों से 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लेने की घोषणा की थी। यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक होगा और 15 अक्टूबर से प्रभावी हो जाएगा।
असबे ने कहा कि यूपीआई पारिस्थितिकी में करीब छह करोड़ सक्रिय व्यापारी हैं और इनमें करीब 75 प्रतिशत क्यूआर-कोड व्यापारियों को अबतक 2,000 रुपये से अधिक का एक भी लेनदेन नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि ऐसे कारोबारियों पर एमडीआर व्यवस्था का कोई असर नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि एक करोड़ रुपये या उससे अधिक सालाना कारोबार वाले कारोबारियों से लिए जाने वाले एमडीआर का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जा सकता है। हालांकि, ऐसे कारोबारी पहले से ही क्रेडिट कार्ड शुल्क को अपने मूल्य निर्धारण में शामिल करते हैं और आम तौर पर यूपीआई भुगतान पर छूट नहीं देते हैं। ऐसे में उनसे यह शुल्क उपभोक्ताओं पर डालने की उम्मीद कम है।
असबे ने कहा कि बाकी हिस्से में उपभोक्ताओं पर शुल्क डाले जाने की संभावना है और बैंकों, एनपीसीआई तथा भुगतान सेवा प्रदाताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए काम करना होगा कि शुल्क का बोझ उपभोक्ताओं पर न पड़े।
उन्होंने बताया कि एमडीआर से मिलने वाली राशि का पांच प्रतिशत युवा उद्यमियों और मदद की जरूरत वाले क्षेत्रों के लिए बनाए जाने वाले कोष में डालने का प्रस्ताव है। एनपीसीआई इस कोष को तैयार करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और अन्य संबंधित पक्षों के साथ काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि यह कोष तीन साल में करीब 3,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसका इस्तेमाल छोटे कारोबारियों के बीच यूपीआई स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए किया जाएगा। इसके तहत सैंडबॉक्स और अन्य भुगतान बुनियादी ढांचे की अधिक तैनाती को बढ़ावा दिया जाएगा।
भाषा प्रेम प्रेम अजय
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