मुंबई, 21 जनवरी (भाषा) भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति भविष्य के लिए खुशनुमा उम्मीद जगाती है और वैश्विक जोखिम एवं नीतिगत अनिश्चितताओं के बावजूद देश सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के जनवरी 2026 बुलेटिन में यह बात कही गई है।
बुधवार को जारी बुलेटिन में कहा गया है कि वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों से हुई, जिसमें वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप, पश्चिम एशिया में तनातनी, रूस-यूक्रेन शांति समझौते को लेकर अनिश्चितता और ग्रीनलैंड विवाद शामिल हैं। इन घटनाओं से वैश्विक जोखिम एवं नीतिगत अस्थिरता बढ़ी, लेकिन भारत की मौजूदा स्थिति आगे के लिए उम्मीद जगाती है।
बुलेटिन के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी वृद्धि के प्रारंभिक अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाते हैं और ये आंकड़े दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बने रहने की तरफ इशारा करते हैं।
दिसंबर 2025 के उच्च-आवृत्ति संकेतकों (निर्यात, जीएसटी संग्रह, ई-वे बिल, पीएमआई आदि) से पता चला कि घरेलू मांग में मजबूती और वृद्धि की रफ्तार बनी हुई है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति दिसंबर में थोड़ा बढ़ी लेकिन वह आरबीआई के संतोषजनक स्तर के निचले स्तर से नीचे ही रही।
आरबीआई बुलेटिन कहता है, ‘वित्तीय संसाधनों के प्रवाह में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। अप्रैल-दिसंबर 2025 तक वाणिज्यिक क्षेत्र में कुल वित्तीय संसाधनों का प्रवाह बढ़कर 30.8 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल 21.3 लाख करोड़ रुपये था। बैंक स्रोतों के अलावा गैर-बैंक स्रोतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।’
दिसंबर 2025 के अंत तक वाणिज्यिक क्षेत्र का कुल कर्ज 15 प्रतिशत बढ़ा, जिसमें गैर-बैंक स्रोतों ने 16.4 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की।
बुलेटिन में कहा गया कि भारत ने निर्यात विविधीकरण और मजबूती के प्रयास तेज किए हैं। देश वर्तमान में 14 देशों या समूहों के साथ व्यापार वार्ता में शामिल है, जिनमें यूरोपीय संघ, खाड़ी सहयोग परिषद और अमेरिका शामिल हैं।
दिसंबर 2025 में भारत ने न्यूजीलैंड और ओमान के साथ व्यापार समझौते पूरे करने की घोषणा की।
बुलेटिन में प्रकाशित लेख के मुताबिक, वर्ष 2025 में देश में कई बड़े आर्थिक सुधार भी हुए, जिनमें कर ढांचे का तर्कसंगत बनाना, नए श्रम कानूनों को लागू करना और वित्तीय क्षेत्र में उदारीकरण शामिल हैं, जिनसे दीर्घकालिक वृद्धि को समर्थन मिलने की उम्मीद है।
भविष्य में नवाचार और स्थिरता के बीच संतुलन, उपभोक्ता संरक्षण और सतर्क नियामकीय दृष्टिकोण भारत की उत्पादकता बढ़ाने और दीर्घकालिक वृद्धि को समर्थन देने में मदद करेंगे।
मुद्रा विनिमय के संदर्भ में यह लेख कहता है कि दिसंबर महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की निकासी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता के चलते भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ।
लेख के मुताबिक, वास्तविक प्रभावी आधार पर दिसंबर में भारतीय रुपया कमजोर हुआ, जिसका कारण मौजूदा कीमतों के प्रभावी आधार पर रुपये में गिरावट और प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की तुलना में भारत में अपेक्षाकृत कम मुद्रास्फीति रही।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवाह में अप्रैल-नवंबर 2025 के दौरान सालाना आधार पर तेजी रही। नवंबर में कुल सकल एफडीआई में जापान, सिंगापुर और अमेरिका का हिस्सा 75 प्रतिशत से अधिक रहा।
हालांकि, शुद्ध एफडीआई नवंबर में अधिक राशि विदेश भेजे जाने के कारण लगातार तीसरे महीने नकारात्मक रहा।
भाषा प्रेम प्रेम रमण
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