नयी दिल्ली, 29 जनवरी (भाषा) कृषि निर्यात में व्यापार नीति का उपयोग कीमतों और उत्पादन में अस्थिरता के बीच अल्पकालिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है, लेकिन बार-बार नीतिगत बदलाव आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करते हैं, अनिश्चितता पैदा करते हैं, विदेशी खरीदारों को दूसरे जगह ले जाते हैं और खोए हुए निर्यात बाजारों को पुनः प्राप्त करना कठिन बना देते हैं। बृहस्पतिवार को संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है।
वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि कृषि निर्यात खाद्य सुरक्षा, प्रसंस्करण सुविधाओं, बुनियादी ढांचे की बाधाओं और विभिन्न नियमों सहित आपूर्ति-पक्ष के कई कारकों से प्रभावित होते हैं।
हालांकि, घरेलू कीमतों और कुछ वस्तुओं के उत्पादन में अस्थिरता को देखते हुए, व्यापार नीति का उपयोग प्राय: अल्पकालिक घरेलू उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। इसमें निर्यात प्रतिबंध या न्यूनतम निर्यात मूल्य जैसे उत्पाद-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना शामिल है।
इसमें कहा गया है कि हालांकि ये उपाय अस्थायी रूप से घरेलू कीमतों में स्थिरता ला सकते हैं, लेकिन इनसे दीर्घकालिक रूप से साख को नुकसान होने का खतरा है। इसका कारण भारत को व्यापक रूप से उच्च गुणवत्ता वाले कृषि उत्पादों का प्रमुख स्रोत के रूप में माना जाता है।
समीक्षा के अनुसार, ‘‘बार-बार नीतिगत बदलाव निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं को काफी हद तक बाधित कर सकते हैं, बाजार में अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं और विदेशी खरीदारों को अन्य स्रोतों की ओर रुख करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। एक बार खोए हुए निर्यात बाजारों को आसानी से वापस नहीं पाया जा सकता।’’
अनुमान के अनुसार, देश में अगले चार वर्षों में कृषि, समुद्री उत्पादों और खाद्य एवं पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात का आंकड़ा 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की क्षमता है।
समीक्षा कहती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आवश्यक खाद्य पदार्थों का रियायती वितरण, बफर स्टॉक का प्रबंधन और मुक्त बाजार बिक्री योजना के माध्यम से बाजार में हस्तक्षेप जैसे उपाय घरेलू बाजार में उचित कीमतों पर कृषि उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध नीतिगत विकल्प हैं।
घरेलू उपलब्धता और कीमतों को स्थिर रखते हुए किसानों को बेहतर आय के लिए वैश्विक बाजारों का लाभ उठाने में सक्षम बनाना संभव है।
घरेलू मांग को पूरा करने और निर्यात क्षमता का उपयोग करने के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखते हुए, कृषि उत्पादन में भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियां निर्यात-आधारित वृद्धि में तब्दील हो सकती हैं। इससे देश कृषि निर्यात में 100 अरब अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य हासिल कर सकता है।
इसमें कहा गया, ‘‘बढ़ती अर्थव्यवस्था की आयात आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत को निर्यात आय बढ़ाने के सभी अवसरों का पता लगाना चाहिए। कृषि निर्यात ऐसा क्षेत्र है जिसमें काफी संभावनाएं हैं और इसे बढ़ाना भी आसान है।’’
समीक्षा के अनुसार, इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलती है और नीतियों को इस अनिवार्यता के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
भाषा रमण अजय
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