सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ योजना को मंजूरी दी, तेल-गैस खोज को मिलेगा बढ़ावा

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सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की 'समुद्र मंथन' योजना को मंजूरी दी, तेल-गैस खोज को मिलेगा बढ़ावा

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  • Publish Date - July 31, 2026 / 05:56 PM IST,
    Updated On - July 31, 2026 / 05:56 PM IST

नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को 84,084 करोड़ रुपये की ‘समुद्र मंथन’ राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल एवं गैस की खोज, अन्वेषण कुओं की ड्रिलिंग और नई खोजों के लिए साझा बुनियादी ढांचे के विकास में आंशिक सहायता प्रदान करना है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस योजना को मंजूरी दी गई। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत लागू की जाने वाली यह योजना समुद्री अन्वेषण से जुड़ी समूची मूल्य शृंखला में व्यापक हस्तक्षेपों का प्रावधान करती है।

अधिकारियों ने कहा कि इस योजना के तहत गहरे समुद्र और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में प्रत्येक कुएं की ड्रिलिंग के लिए 650 करोड़ रुपये तक की सहायता दी जाएगी, ताकि घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाया जा सके और आयात पर निर्भरता कम की जा सके।

समुद्र मंथन योजना के कुल परिव्यय में से 43,200 करोड़ रुपये वर्ष 2031 तक पांच वर्षों के दौरान गहरे समुद्र में ड्रिलिंग गतिविधियों के समर्थन के लिए आवंटित किए जाएंगे।

इसके अलावा, 10,000 करोड़ रुपये नई खोजों को उत्पादन में लाने के लिए आवश्यक साझा बुनियादी ढांचे पर खर्च किए जाएंगे।

आधिकारिक बयान के मुताबिक, योजना के तहत समुद्री क्षेत्र से आंकड़ा जुटाने के लिए 28,534 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जबकि तेल एवं गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों के विकास के लिए 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएंगे।

गौरतलब है कि गहरे समुद्र क्षेत्रों में, जहां पानी की गहराई 1,500 मीटर से अधिक होती है, एक कुएं की ड्रिलिंग पर 10 करोड़ डॉलर से 25 करोड़ डॉलर तक की लागत आ सकती है और इसके सफल होने की कोई गारंटी नहीं होती है।

बयान में कहा गया कि यह योजना समुद्री बेसिन क्षेत्रों में अन्वेषण गतिविधियों को तेज करेगी, निवेश आकर्षित करेगी और भारत की अपतटीय हाइड्रोकार्बन क्षमता को विकसित करने में मदद करेगी।

भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता पिछले दशक में 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत हो गई है, जबकि देश अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है।

सरकार का कहना है कि यह योजना 60 करोड़ टन से अधिक तेल एवं गैस भंडार की खोज, घरेलू उत्पादन में वृद्धि, रोजगार सृजन और विनिर्माण को बढ़ावा देने में सहायक होगी।

इस योजना के तहत उन्नत प्रौद्योगिकी, बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और साझा बुनियादी ढांचे के जरिए अपतटीय अन्वेषण को गति दी जाएगी, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।

इस योजना की रूपरेखा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले वर्ष 2025 में अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन के दौरान पेश की थी। उन्होंने देश के अपतटीय ऊर्जा संसाधनों के दोहन के लिए आधुनिक ‘समुद्र मंथन’ का आह्वान किया था।

भारत ने वर्ष 1997 के बाद से अपनी तेल और गैस अन्वेषण नीति में तीन बार बदलाव किए हैं। इसके तहत लागत वसूली के बाद मुनाफा साझा करने वाले उत्पादन साझेदारी अनुबंध (पीएससी) से हटकर अब राजस्व साझेदारी और अन्वेषण प्रतिबद्धताओं पर आधारित प्रणाली अपनाई गई है।

भाषा प्रेम प्रेम रमण

रमण