नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) सरकार ने भारत से प्रबंधित पात्र निवेश कोष के लिए वैश्विक आय पर कर छूट पाने की पात्रता शर्तों में व्यापक ढील देने का प्रस्ताव किया है। इस पहल का मकसद भारत को वैश्विक कोष प्रबंधन केंद्र के रूप में मजबूत बनाना है।
कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के अनुसार, वैश्विक आय पर कर छूट का लाभ लेने के लिए ‘ऑफशोर फंड’ यानी विदेशी क्षेत्र में पंजीकृत कोष को अब न्यूनतम 25 निवेशकों की अनिवार्यता, किसी एक निवेशक की अधिकतम 10 प्रतिशत हिस्सेदारी, किसी एक इकाई में कुल कोष का 25 प्रतिशत से अधिक निवेश नहीं करने, संबद्ध इकाइयों में निवेश पर पाबंदी तथा 100 करोड़ रुपये के न्यूनतम मासिक औसत कोष जैसी शर्तों का पालन करने की जरूरत नहीं होगी।
सरकार ने यह विधेयक संसद सदस्यों के बीच वितरित कर दिया है और इसे जल्द ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में पेश कर सकती हैं।
विधेयक में प्रस्तावित संशोधनों के तहत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) से संचालित कोषों के लिए अलग कर छूट संबंधी शर्तों को भी समाप्त करने का प्रस्ताव है।
इससे आईएफएससी और गैर-आईएफएससी ‘ऑफशोर’ कोषों के बीच मौजूद अस्पष्टता दूर होगी और भारत से प्रबंधित सभी पात्र विदेशी निवेश कोषों के लिए एक समान पात्रता रूपरेखा लागू होगी।
नांगिया ग्लोबल में एमएंडए (विलय एवं अधिग्रहण) कर भागीदार अभीत सचदेवा ने कहा, ‘‘इन प्रस्तावित बदलावों से ‘ऑफशोर’ कोषों के लिए भारत की घरेलू कोष प्रबंधन व्यवस्था अधिक आकर्षक बनेगी और कोष प्रबंधन गतिविधियों के भारत में स्थानांतरण को बढ़ावा मिलेगा।’’
विधेयक में पांच जून को जारी उस अध्यादेश का स्थान लेने का भी प्रस्ताव है, जिसके तहत विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट दी गई थी।
यह अध्यादेश पश्चिम एशिया संकट के कारण रुपये पर बढ़ते दबाव को कम करने और विदेशी पूंजी आकर्षित करने के उद्देश्य से जारी किया गया था।
विधेयक के उद्देश्य एवं कारण संबंधी विवरण में कहा गया है कि अध्यादेश का उद्देश्य बाहरी आर्थिक झटकों के प्रभाव को कम करना, घरेलू अर्थव्यवस्था में स्थिरता सुनिश्चित करना तथा वैश्विक परिस्थितियों से प्रभावित प्रमुख क्षेत्रों को समर्थन देना था।
इसमें कहा गया है कि वित्त अधिनियम, 2026 लागू होने के बाद संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों के आधार पर यह महसूस किया गया कि अध्यादेश का उद्देश्य अब भी प्रासंगिक है, लेकिन उसे व्यापक रूप से हासिल करने के लिए अतिरिक्त कराधान उपायों की आवश्यकता है।
‘‘लगातार बदलते वैश्विक घटनाक्रम और समय पर समन्वित प्रतिक्रिया की आवश्यकता को देखते हुए इन उपायों को इसी विधेयक में शामिल करना उपयुक्त माना गया है।’’
सचदेवा के अनुसार, इन बदलावों से भारत की घरेलू कोष प्रबंधन व्यवस्था विदेशों में पंजीकृत कोषों के लिए अधिक आकर्षक बनेगी और अधिक कोष प्रबंधन गतिविधियां भारत स्थानांतरित होने की संभावना है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जून में कहा था कि विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार द्वारा घोषित उपाय पहला कदम हैं और आगे भी अतिरिक्त कदम उठाए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा था, ‘‘हमारा मानना है कि भारत में और अधिक विदेशी पूंजी आने की आवश्यकता है।’’
सरकार ने पांच जून को सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन बोझ कम करने के उद्देश्य से ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ यानी पूर्ण रूप से सुलभ मार्ग (एफएआर) के तहत निर्दिष्ट प्रतिभूतियों की सूची का विस्तार करते हुए नई सरकारी प्रतिभूतियों के निर्गम को भी इसमें शामिल किया था।
एफएआर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 2020 में शुरू की गयी एक रूपरेखा है जो विदेशी निवेशकों को बिना किसी निवेश सीमा या प्रतिबंध के विशिष्ट भारतीय सरकारी बॉन्ड खरीदने की अनुमति देती है।
आरबीआई ने भी पांच जून को बैंकों को तीन से पांच वर्ष की अवधि वाले विदेशी मुद्रा प्रवासी (बैंक) (एफसीएनआर-बी) जमा पर 30 सितंबर तक आरबीआई की अदला-बदली सुविधा का उपयोग करने की अनुमति दी थी। इससे बैंक अमेरिकी डॉलर जमा को आरबीआई के साथ अदला-बदली कर मुद्रा जोखिम का बेहतर प्रबंधन कर सकेंगे।
विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को 30 सितंबर तक बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) जुटाने के लिए रियायती विदेशी मुद्रा अदला-बदली सुविधा भी उपलब्ध कराई गई।
इन सभी योजनाओं के तहत 31 जुलाई तक कुल 40.81 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी प्राप्त हुई।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 24 जुलाई को समाप्त सप्ताह में 6.12 अरब डॉलर बढ़कर 682.35 अरब डॉलर हो गया।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की कर भागीदार ऋचा साहनी ने कहा कि यह विधेयक अल्पकालिक राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता की दिशा में संतुलित बदलाव का संकेत देता है।
उन्होंने कहा कि अध्यादेश ने वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों से उत्पन्न तत्काल चुनौतियों का समाधान किया था, जबकि अब सरकार ने संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद अतिरिक्त सुधारों को शामिल किया है। इससे कर व्यवस्था में अधिक निश्चितता आएगी और भारत की आर्थिक मजबूती बढ़ेगी।
भाषा रमण अजय
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