नयी दिल्ली, 19 मार्च (भाषा) अपनी तरह के एक अनोखे तलाशी अभियान में, उत्तराखंड जीएसटी जांच विभाग के अधिकारियों ने 150 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कर चोरी का पता लगाने के लिए कई फ़र्में बनाईं और एक संदिग्ध कंपनी के साथ कारोबारी संबंध स्थापित किए।
जीएसटी अधिकारियों ने बताया कि इस पूरी कवायद को शुरू करने और कारोबारी लेन-देन शुरू करने के लिए दोषी कंपनी का भरोसा जीतने में उन्हें कई महीने लग गए।
राज्य माल एवं सेवा कर (जीएसटी), कुमाऊं क्षेत्र के विशेष जांच ब्यूरो के संयुक्त आयुक्त रोशन लाल ने बताया, ‘‘कुछ महीने पहले, हमें सितारगंज स्थित एक कंपनी के ख़िलाफ़ कर चोरी की जानकारी मिली थी। यह कंपनी ट्रांसफ़ॉर्मर और उससे जुड़ी सेवाओं की आपूर्ति का कारोबार करती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमारे सूत्रों ने हमें बताया कि यह कंपनी किसी दूसरी कंपनी के नाम पर ख़रीद-बिक्री कर रही थी। उस दूसरी कंपनी को इसने काफ़ी पहले ही बंद कर दिया था, और अब यह कर बचाने के लिए अपनी बिक्री को छिपा रही थी।’’
विभाग ने बताया कि 18 मार्च, 2026 को आपूर्तिकर्ता की फ़ैक्टरी में तलाशी और ज़ब्ती का छापा मारा गया। लगभग आठ घंटे तक चली इस कार्रवाई के बाद, बिक्री, ख़रीद, माल के स्टॉक, माल की आवाजाही और वित्तीय लेन-देन से जुड़े कई दस्तावेज़ ज़ब्त किए गए।
जांच टीम के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘‘हमने अपने दो अधिकारियों को इस काम पर लगाया और उनसे कहा कि वे कुछ फ़र्म पंजीकृत करवाएं और इस दोषी कंपनी के साथ कारोबारी संबंध स्थापित करें। हमारे कुछ अधिकारियों ने कर्मचारी बनकर काम किया और कंपनी के उत्पाद ख़रीदने में दिलचस्पी दिखाई। ऐसा करते हुए हमें पता चला कि सितारगंज स्थित यह फ़र्म कर बचाने के लिए अपनी बंद हो चुकी फ़र्मों के नाम का गलत इस्तेमाल कर रही है।’’
विभाग ने बताया कि आपूर्तिकर्ता ने कर भुगतान के अलग-अलग तरीकों से 19.83 करोड़ रुपये का जीएसटी राजस्व जमा किया है। यह राशि देर रात मौके पर ही नकद या क्रेडिट के रूप में जमा की गई।
अधिकारी ने बताया, ‘‘छापेमारी के दौरान लगभग 20 करोड़ रुपये का जीएसटी राजस्व बरामद किया गया और सरकारी खजाने में जमा कर दिया गया। आगे की जांच और विश्लेषण होने तक जीएसटी और अन्य खातों को फ़िलहाल रोक दिया गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘चूंकि जांच अभी भी जारी है और हमें शक है कि इस रैकेट में और भी लोग शामिल हो सकते हैं, इसलिए हम अपने चल रहे अभियानों के बारे में अभी और ज़्यादा जानकारी नहीं देना चाहते। हमने इसके नेटवर्क की पहचान करने के लिए एआई टूल्स और फॉरेंसिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया है।’’
भाषा राजेश राजेश अजय
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